2017 और 2022 की हार से अब तक नहीं उबर पाई पार्टी, अमृतपाल सिंह की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और अकाली दल के भीतर टूट ने बढ़ाई चिंता; भाजपा के साथ संभावित समझौते पर भी टिकी नजरें
चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगी है। राजनीतिक दलों ने अपने-अपने समीकरण बनाने शुरू कर दिए हैं, लेकिन इस सियासी मुकाबले में शिरोमणि अकाली दल की स्थिति सबसे दिलचस्प रहने वाली है। कभी पंजाब की सत्ता का प्रमुख केंद्र रहा यह क्षेत्रीय दल अब अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा हासिल करने की कोशिश कर रहा है। पार्टी के सामने केवल आम आदमी पार्टी और कांग्रेस जैसी प्रतिद्वंद्वी पार्टियां ही नहीं, बल्कि पंथक राजनीति में उभर रहे नए चेहरे भी चुनौती बन रहे हैं।
अकाली दल की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए पिछले एक दशक के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी लगातार कमजोर होती गई। 2022 के चुनाव में स्थिति और खराब हो गई तथा 117 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी केवल तीन सीटें जीत सकी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को सिर्फ बठिंडा सीट पर सफलता मिली। हरसिमरत कौर बादल की जीत के बावजूद पार्टी का राज्यव्यापी वोट प्रतिशत घटकर लगभग 13.42 फीसदी रह गया।
सत्ता से दूरी की वजह बने पुराने विवाद
अकाली दल के लिए सबसे मुश्किल दौर 2015 में शुरू हुआ, जब पंजाब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं ने बड़ा राजनीतिक और धार्मिक विवाद खड़ा कर दिया। इसके विरोध में कोटकपूरा और बहबल कलां में प्रदर्शन हुए। पुलिस फायरिंग में दो लोगों की मौत के बाद तत्कालीन सरकार को भारी विरोध का सामना करना पड़ा।
इसी दौरान डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को माफी दिए जाने का मामला भी विवादों में रहा। बाद में यह फैसला वापस ले लिया गया, लेकिन इस घटनाक्रम ने अकाली नेतृत्व की राजनीतिक विश्वसनीयता को प्रभावित किया।
नशे की समस्या, भ्रष्टाचार के आरोप और सरकार के कामकाज को लेकर विपक्ष ने लगातार सवाल उठाए। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इन मुद्दों को चुनावी अभियान का हिस्सा बनाया। परिणामस्वरूप 2017 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल 15 सीटों पर सिमट गया। 2022 में पार्टी का प्रदर्शन और नीचे चला गया।
अमृतपाल की राजनीति से पंथक वोटों का नया समीकरण
अकाली दल के सामने अब एक नई राजनीतिक चुनौती अमृतपाल सिंह से जुड़ी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब से उनकी जीत ने यह संकेत दिया कि पंजाब में पंथक राजनीति के भीतर नए राजनीतिक विकल्प के लिए जगह मौजूद है।
अमृतपाल सिंह से जुड़ा शिरोमणि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। संगठन की नजर उन क्षेत्रों पर है जहां सिख मतदाताओं की संख्या अधिक है। नशे के खिलाफ अभियान, युवाओं का विदेश पलायन, बेरोजगारी, बंदी सिखों की रिहाई और पंजाब के अधिकार जैसे मुद्दों को उठाकर यह संगठन अपना समर्थन आधार बढ़ाना चाहता है।
अमृतपाल सिंह के जेल में होने के बावजूद उनके समर्थकों की राजनीतिक गतिविधियां जारी हैं। यदि संगठन विधानसभा चुनाव में प्रभावशाली उम्मीदवार उतारता है तो इसका सीधा असर अकाली दल के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है। खासकर उन सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है जहां पंथक मतदाता चुनाव परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हालांकि, किसी लोकसभा सीट पर मिली जीत को पूरे पंजाब में विधानसभा स्तर पर समर्थन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। वारिस पंजाब दे के सामने भी मजबूत संगठन तैयार करने और सभी क्षेत्रों में उम्मीदवार खड़े करने की चुनौती रहेगी।
भाजपा के साथ रिश्ते बहाल करना कितना आसान?
अकाली दल और भाजपा का पुराना गठबंधन 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के बाद टूट गया था। दोनों दल करीब दो दशक तक पंजाब की राजनीति में सहयोगी रहे। अब 2027 के चुनाव से पहले दोनों के बीच दोबारा राजनीतिक समझौते की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।
इस संभावित गठबंधन के पीछे दोनों दलों के अपने राजनीतिक हित हैं। अकाली दल को भाजपा के शहरी और हिंदू मतदाता आधार से फायदा मिलने की उम्मीद हो सकती है, जबकि भाजपा को अकाली दल के ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद संगठन और सिख मतदाताओं के बीच पारंपरिक पहुंच का लाभ मिल सकता है।
लेकिन इस बार परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं। भाजपा पंजाब में अपना स्वतंत्र संगठन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की ओर से सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी के संकेत भी दिए गए हैं। ऐसे में सीटों के बंटवारे और राजनीतिक नेतृत्व को लेकर दोनों दलों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं होगा। अभी गठबंधन की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
पार्टी के भीतर एकजुटता भी बड़ी परीक्षा
अकाली दल की परेशानी केवल चुनावी प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष और अलग-अलग गुटों की गतिविधियां भी सामने आई हैं। कई वरिष्ठ नेताओं ने सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व पर सवाल उठाए और अलग राजनीतिक राह अपनाई।
हालांकि, अब पार्टी में पुराने नेताओं की वापसी के संकेत भी मिलने लगे हैं। 6 नवंबर को वरिष्ठ नेता प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा की वापसी ने संगठनात्मक एकजुटता की कोशिशों को नई चर्चा दी है। इससे पहले भी पार्टी के पुराने नेताओं को साथ लाने की कवायद चलती रही है।
बादल परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल
शिरोमणि अकाली दल की स्थापना के बाद से पार्टी ने पंजाब की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में पार्टी ने लंबे समय तक सत्ता संभाली, लेकिन मौजूदा दौर में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं का भरोसा वापस हासिल करने की है।
2027 का चुनाव पार्टी के लिए केवल विधानसभा में सीटें बढ़ाने का मुकाबला नहीं होगा, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान और क्षेत्रीय प्रभाव को फिर से स्थापित करने की परीक्षा भी होगा। उसे बेअदबी और गोलीकांड जैसे पुराने विवादों पर जनता के सवालों का जवाब देना होगा। साथ ही युवाओं, किसानों और आम लोगों के मुद्दों पर अपनी नई राजनीतिक दिशा भी स्पष्ट करनी होगी।
भाजपा के साथ संभावित गठबंधन, पंथक राजनीति में अमृतपाल सिंह का प्रभाव और पार्टी के भीतर नेताओं की एकजुटता आने वाले चुनाव में महत्वपूर्ण कारक रहेंगे। पंजाब की राजनीति में अकाली दल की वापसी कितनी मजबूत होगी, इसका फैसला अंततः मतदाता ही करेंगे।
