*सरकार लाचार, दर्ज नहीं कर सकती FIR, न्यायिक आदेश बाधक…… हमारी न्याय प्रणाली अत्यंत पीड़ादायक घटना : उपराष्ट्रपति उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का बड़ा बयान

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चंडीगढ़ । उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ 6 जून को चंडीगढ़ पहुंचे थे। यहां पर उन्होंने बार एसोसिएशन के लोगों को राजभवन में मुलाकात के लिए बुलाया था। इस मुलाकात में अपने संबोधन के दौरान उपराष्ट्रपति ने कहा कि सरकार लाचार है बिना अनुमति के एफआईआर भी दर्ज नहीं कर सकती है।

यह आदेश तीन दशक से भी अधिक पुराना है। वह लगभग अभेद्य सुरक्षा प्रदान करता है। जब तक न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर पर कोई पदाधिकारी अनुमति नहीं देता, FIR दर्ज नहीं की जा सकती। तो मैं स्वयं से एक सवाल पूछता हूं पीड़ा में, चिंता में, व्याकुलता में कि वह अनुमति क्यों नहीं दी गई? यह तो न्यूनतम कदम था, जो सबसे पहले उठाया जाना चाहिए था।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का बयान

उन्होंने आगे कहा, मैंने यह मुद्दा उठाया है। अंततः, अगर किसी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव आता है, क्या वही इसका उत्तर है? अगर कोई ऐसा अपराध हुआ है, जो लोकतंत्र और कानून के शासन की नींव को हिला देता है, तो उसे दंड क्यों नहीं मिला? हम तीन महीने से अधिक समय खो चुके हैं और जांच की शुरुआत भी नहीं हुई। जब भी आप अदालत जाते हैं, वे पूछते हैं, FIR में देरी क्यों हुई?

न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार

धनखड़ ने आगे कहा कि क्या न्यायाधीशों की समिति को संवैधानिक या वैधानिक मान्यता प्राप्त है? क्या उसकी रिपोर्ट से कोई ठोस कार्यवाही हो सकती है? अगर संविधान में न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया लोकसभा या राज्यसभा में प्रस्ताव द्वारा ही निर्धारित है, तो यह समिति उस प्रक्रिया या FIR का विकल्प नहीं हो सकती। अगर हम खुद को लोकतंत्र का दावा करते हैं, तो हमें यह मानना होगा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों को ही केवल कार्यकाल के दौरान अभियोजन से छूट है, किसी और को नहीं। अब अगर ऐसा कोई कृत्य, जो अपराध है, सामने आता है और उसके पीछे नकदी की बात सुप्रीम कोर्ट द्वारा सामने लाई जाती है, तो उस पर कार्यवाही क्यों नहीं?

देशभर की बार एसोसिएशन ने उठाएं मुद्दे

उपराष्ट्रपति ने आगे कहा कि मैं पाकर खुश हूं कि देशभर की बार एसोसिएशन इस मुद्दे को उठा रही हैं। मुझे आशा है कि FIR दर्ज होगी। अनुमति पहले दिन दी जा सकती थी। रिपोर्ट आने के बाद तो कम से कम दी ही जानी थी। क्या यह अनुमति न्यायिक पक्ष से दी जा सकती थी? न्यायिक पक्ष में जो हुआ है, वह सबके सामने है। उन्होंने आगे कहा कि मैं पूर्व मुख्य न्यायाधीश का आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने दस्तावेजों को सार्वजनिक किया। हम यह कह सकते हैं कि नकदी की जब्ती हुई, क्योंकि रिपोर्ट कहती है और रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक की। हमें लोकतंत्र के विचार को नष्ट नहीं करना चाहिए। हमें अपनी नैतिकता को इस कदर गिराना नहीं चाहिए। हमें ईमानदारी को समाप्त नहीं करना चाहिए।

हमारी न्याय प्रणाली अत्यंत पीड़ादायक घटना- उपराष्ट्रपति

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के सदस्यों से बातचीत करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारी न्याय प्रणाली एक अत्यंत पीड़ादायक घटना से जूझ रही है, जो मार्च मध्य में दिल्ली में एक कार्यरत न्यायाधीश के निवास पर हुई थी। वहां, नकदी बरामद हुई, जो स्पष्ट रूप से अवैध, बेहिसाब और अपवित्र थी। यह जानकारी 6-7 दिन बाद सार्वजनिक हुई। कल्पना कीजिए, यदि यह बाहर नहीं आती, तो क्या होता? तो हमें यह भी नहीं पता चलता कि यह एकमात्र मामला है या और भी हैं। जब भी इस तरह की बेहिसाब नकदी मिलती है, तो हमें यह जानना चाहिए कि यह पैसा किसका है? इसकी मनी ट्रेल क्या है? क्या इस पैसे ने न्यायिक कार्य में प्रभाव डाला? यह सब केवल वकीलों की चिंता नहीं, आम जनता की भी चिंता है।

जनता का विश्वास जरूरी- धनखड़

उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा है कि मैं इस बात से संतुष्ट हूं कि बार एसोसिएशन इस पर काम कर रही हैं। लेकिन जनता का विश्वास सभी संस्थाओं में अत्यंत आवश्यक है। मैं केवल इतना कहता हूं कि यह सोचकर कि यह मामला ठंडा पड़ जाएगा, या मीडिया का ध्यान नहीं रहेगा, यह गलत होगा। जो लोग इस अपराध के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए। केवल गहन, वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच ही जनता का विश्वास बहाल कर सकती है।

न्यायपालिका और लोकतंत्र की नींव डगमगाई

उन्होंने याद दिलाया, सरवान सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1957 का एक प्रसिद्ध मामला है, जिसमें सच्चाई और अनुमानित सच्चाई के बीच बहुत पतला फर्क था। लेकिन यह फर्क विश्वसनीय साक्ष्यों से ही तय किया जा सकता है। मैं किसी को दोषी नहीं ठहरा रहा हूं। लेकिन यह तय है कि एक ऐसा अपराध हुआ है, जिसने न्यायपालिका और लोकतंत्र की नींव हिला दी है। मुझे आशा है, इसका संज्ञान लिया जाएगा। धनख़ड़ ने आगे कहा कि मैं राजस्थान हाई कोर्ट बार एसोसिएशन का पूर्व अध्यक्ष रहा हूं। शायद यह पहला मौका है जब हम इस तरह एकत्र हुए हैं। लोकतंत्र में वकीलों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। और जब न्याय प्रणाली खतरे में हो तो बार के सदस्यों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

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