अब केजरीवाल का क्या होगा-दिल्ली में आप की हार के दिखाई देंगे ये 7 असर

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अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की टीम तीसरी कोशिश में मुंह के बल गिरी। खुद केजरीवाल अपनी सीट गंवा बैठा। पिछले 5 वर्षों में दिल्ली की राजनीति बहुत गर्म रही। केजरीवाल एंड कंपनी पर तमाम सवाल रहे। केजरीवाल सवालों को नकारते रहे. जवाब जनता का आया। बीजेपी 27 वर्ष बाद दिल्ली की सत्ता में वापसी की।  अब जबकि दिल्ली में आप साफ हो गई है, तो आने वाले समय में खुद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी और विपक्ष की राजनीति पर इसका क्या असर हो सकता है, समझते हैं।
केजरीवाल ब्रांड केजरीवाल ध्वस्त
करप्शन के खिलाफ चेहरा. स्वच्छ शासन-प्रशासन देने की समझ. स्पष्ट विजन. राजनीति में बीजेपी-कांग्रेस से इतर विकल्प बनने का माद्दा. सबकुछ कहा गया। केंद्र की एजेंसियों के हत्थे चढ़ने के बाद केजरीवाल ने बहुत कुछ गंवाया।  दिल्ली के नतीजों ने ‘ब्रांड केजरीवाल’ के साथ जुड़े तमाम चमकदार विशेषणों को बेरंगत कर दिया।
केजरीवाल की फ्रीबीज पॉलिटिक्स फेल
फ्रीबीज पॉलिटिक्स को संस्थागत रूप दिया. बाद में इसे कई कांग्रेसी सरकारों ने अपनाया. बीजेपी की सरकारों ने भी चुनावी राजनीति के इस सरल रूट को पकड़ा. इस बार भी केजरीवाल पुराने फ्रीबीज के साथ बहुत कुछ और फ्री लेकर आए. लेकिन जनता ने ही कह दिया कि अब बस. निश्चित तौर पर वोटर्स की ये मैच्योरिटी आने वाले समय में राजनीति पार्टियों के लिए एक सबक हो सकती है, देशहित में हो सकती है।. आप में ठहराव
आप का विस्तार पहले से ही ठहरा हुआ था, विस्तार की संभावना अब और कम हो जाएगी. गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक समेत कुछ और राज्यों केजरीवाल ने पार्टी की नींव डाली लेकिन पूरी इमारत कहीं नहीं बनी. कई जगह तो नींव के ईंट-रोड़े ही बिखर गए. अब अगले 5 साल केजरीवाल दिल्ली में अपने वजूद को वापस पाने पर फोकस करने के लिए मजबूर हो सकते हैं. ऐसा हुआ तो दूसरे राज्यों में पार्टी के विस्तार की संभावनाएं और कम हो जाएंगी.
 करप्शन का घेरा
केजरीवाल और उनके तमाम बड़े चेहरे हाल ही में जेल से लौटे हैं. अब इन्हें दिल्ली की उस जनता ने नकार दिया है, जिसने उन्हें पहला प्यार दिया था. दिल्ली का जनादेश उस राजनीतिक दुविधा को खत्म कर सकता है, जो केजरीवाल एंड कंपनी पर और ज्यादा सख्ती करते हुए हो सकता था. ऐसा हुआ तो आने वाले समय में केजरीवाल और उनके साथियों की मुश्किलें करप्शन के मामलों में बढ़ सकती है.
 विपक्षी एकता ध्वस्त
बमुश्किल 8 महीने हुए हैं. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और आप दिल्ली में साझीदार थे. खुद नेहरू-गांधी परिवार ने आप के उम्मीदवार को वोट किया. इस विधानसभा चुनाव में दोनों अलग-अलग ही नहीं लड़े, इनके रिश्ते भी तार-तार हुए. यकीनन INDIA ब्लॉक (या जो भी नाम दें) की एकजुटता की अब हाल-फिलहाल में उम्मीद करना भी बेमानी होगी।
 बिहार चुनाव पर असर
बिहार में न केजरीवाल की कोई धमक या चमक है और न ही आप की जमीन. मगर दिल्ली के नतीजों के बाद बीजेपी विरोधी पार्टियों के बीच जो आपसी किच-किच शुरू होगी, उसका असर बिहार में महागठबंधन पर पड़े बिना शायद नहीं रहेगा. कांग्रेस पर दिल्ली में आप का खेल बिगाड़ने के आरोप लगेंगे. यह सब हुआ तो बिहार में महागठबंधन की चुनावी संभावनाओं को नुकसान जरूर पहुंच सकता है।
 कांग्रेस-आप कड़वाहट
दिल्ली के चुनाव प्रचार में कांग्रेस के अल्फाज आप के लिए बड़े ही तीखे रहे. आप के खिलाफ कमोवेश बीजेपी की ही लाइन पर कांग्रेस दिखी. यहां तक कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने भी आम आदमी पार्टी पर कई गंभीर टिप्पणी की. खुद राहुल-प्रियंका ने आप की फ्रंट लीडरशिप को भी नहीं बख्शा. केजरीवाल का व्यक्तित्व और मिजाज जिस तरह का रहा है उसे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि वे कांग्रेस की इस अदावत को शायद लंबे वक्त तक याद रखेंगे. दिल्ली में हारे हुए और खुद अपनी सीट पर कांग्रेस के वोट कटवा संदीप दीक्षित की वजह से खार खाए केजरीवाल कई जगहों पर कांग्रेस के लिए खेल बिगाड़ सकते हैं. हालांकि लंबी अवधि में आप से स्पष्ट दूरी कांग्रेस के लिए लाभ का सौदा होगी या फायदे का, ये अलग विश्लेषण का विषय है।
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