आईजीएमसी शिमला विवाद का सज्जन अंत …जादू की झप्पी…एक सॉरी… फिर गले लगकर मिटाई कड़वाहट

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डॉ. राघव व अर्जुन ने पेश की पश्चाताप और सम्मान की मिसाल

प्रदेश सचिवालय में लिखी गई भाईचारे की नई इबारत

एएम नाथ। शिमला :  कभी-कभी एक ‘सॉरी’ और एक ‘गले मिलने की गर्मजोशी उन घावों को भर देती है, जिन्हें कानून और दलीलें नहीं भर पातीं। शिमला के आईजीएमसी अस्पताल में हुआ वह बहुचर्चित विवाद, जिसने पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और जनमानस को उद्वेलित कर दिया था, आज एक बेहद भावुक और गरिमामयी मोड़ पर समाप्त हुआ। डॉक्टर और मरीज ने एक-दूसरे का हाथ थामकर और गले मिलकर न केवल पुरानी कड़वाहट को दफन किया, बल्कि समाज को क्षमा की सबसे बड़ी मिसाल भी दी।
राज्य सचिवालय में मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार नरेश चौहान की मौजूदगी में यह समझौता हुआ। यहाँ दृश्च वदता हुआ था, जहाँ कुछ दिन पहले तक आक्रोश और आरोप-प्रत्यारोप थे, वहां आज पश्चाताप और सम्मान था। डॉक्टर राघव नरूला और मरीज अर्जुन सिंह पंवार ने खुले मन से अपनी गलतियाँ स्वीकार कीं। इस दौरान वहां मौजूद दोनों पक्षों के माता-पिता की आंखों में अपने बच्चों के बेहतर भविष्य और विवाद खत्म होने का संतोष साफ झलक रहा था।
मरीज अर्जुन सिंह पंवार ने परिपक्कता का परिचय देते हुए कहा कि डॉक्टर साहब ने उदारता दिखाई और मैंने उसे स्वीकार किया। मुझे दुख है कि हमारे विवाद की वजह से आम जनता को परेशानी हुई, मैं इसके लिए सभी से माफी मांगता हूं। वहीं, डॉक्टर राघव ने अर्जुन को मीडिया के सामने गले लगाकर यह स्पष्ट कर दिया कि उनके मन में अब कोई द्वेष नहीं है। दोनों ने सहमति से अपनी कानूनी शिकायतें वापस लेने का निर्णय लिया है।
22 दिसंबर को हुई उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा था, जिससे डॉक्टरों की हड़ताल और स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई थीं। लेकिन आज जिस तरह से दोनों पक्षों ने हाथ मिलाया है, वह स्वास्थ्य जगत और समाज के लिए एक बड़ी मिसाल है।

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जब ममता ने संभाला न्याय का मोर्चा

इस पूरे विवाद में कानूनी दलीलों और आरोपों के शोर के बीच, समझौते की सबसे सुंदर और भावुक तस्वीर तब उभरी जब ममता ने न्याय का मोर्चा संभाला। सचिवालय के उस कमरे में जब डॉक्टर राघव की माँ ने बोलना शुरू किया, तो वहां मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं। डॉक्टर राघव की माँ ने एक माँ की सहज संवेदनशीलता के साथ कहा कि आवेश में गलतियाँ तो दोनों ओर से हुई थीं, लेकिन इस कड़वाहट को पालकर क्या मिलेगा? आखिरकार दोनों ही तो हमारे अपने बच्चे हैं। उनके इन शब्दों ने नफरत की दीवार को एक पल में बहा दिया। उन्होंने आगे कहा कि हमारा मकसद किसी को नीचा दिखाना या नफरत फैलाना नहीं, बल्कि अपने बच्चों के व्यवहार में सुधार लाना होना चाहिए। गुस्से में गलतियाँ हो जाती हैं, लेकिन उन्हें ताउम्र सीने से चिपकाए रखना समझदारी नहीं है। एक माँ की इस ममता भरी अपील ने न्याय और प्रतिशोध के बीच के अंतर को खत्म कर दिया। दूसरी ओर, मरीज अर्जुन की माँ ने भी उसी विशाल हृदय का परिचय दिया। उन्होंने इस समाधान पर संतुष्टि जलाते हुए कहा कि वे खुश हैं कि उनके बच्चों का भविष्य अब विवादों की भेंट नहीं चढ़ेगा।

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