आपदाओं में ‘जीरो डेथ’ का लक्ष्य, हिमालयी क्षेत्र सबसे बड़ी चुनौती : अमित शाह ने आपदा प्रबंधन को राहत-केंद्रित व्यवस्था से जोखिम कम करने और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर आधारित मॉडल में बदलने पर जोर दिया

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नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारत में आपदाओं के दौरान ‘शून्य मृत्यु’ (Zero Death) का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। नई दिल्ली में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) की गवर्निंग बॉडी की तीसरी बैठक की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान देश की आपदा प्रबंधन नीति में व्यापक बदलाव आया है।

अमित शाह के अनुसार, भारत अब केवल आपदा के बाद राहत और पुनर्वास तक सीमित व्यवस्था से आगे बढ़कर जोखिम कम करने, प्रारंभिक चेतावनी और समय रहते बचाव पर केंद्रित मॉडल की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि हाल की कई आपदाओं में समय पर चेतावनी, बेहतर तैयारी और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय से जानमाल के नुकसान को कम करने में मदद मिली है।

हिमालय में बढ़ रहा ग्लेशियर झीलों का खतरा

हालांकि, ‘जीरो डेथ’ का लक्ष्य हिमालयी क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती है। हिमालय में ग्लेशियर झीलों के तेजी से विस्तार ने वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ाई है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चार दशकों के उपग्रह आंकड़ों के आधार पर ग्लेशियर झीलों के विस्तार को लेकर चेतावनी दी थी। 1984 से 2023 के बीच 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली 2,431 ग्लेशियर झीलों में से 676 के आकार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इनमें 130 झीलें भारत में हैं। इनमें 65 सिंधु, 7 गंगा और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में स्थित हैं।

आंकड़ों के अनुसार, इनमें से 601 झीलों का आकार दोगुने से अधिक हो चुका है।

हिमाचल की घेपांग घाटी झील का क्षेत्रफल 178% बढ़ा

हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाटी झील में भी तेजी से विस्तार दर्ज किया गया है। उपलब्ध उपग्रह आंकड़ों के अनुसार, 1989 से 2022 के बीच इस झील का क्षेत्रफल 178 प्रतिशत बढ़कर 36.49 हेक्टेयर से 101.30 हेक्टेयर हो गया।

विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय यह है कि ग्लेशियर झीलों के आकार में वृद्धि से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ सकता है। अचानक झील का बांध टूटने या पानी का तेज बहाव आने से निचले इलाकों में भारी तबाही हो सकती है।

केदारनाथ से चमोली तक दिखी हिमालय की संवेदनशीलता

हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं का खतरा नया नहीं है। केदारनाथ आपदा, सिक्किम में दक्षिण ल्होनक झील से आई बाढ़ और वर्ष 2021 की चमोली आपदा ने पहाड़ी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को उजागर किया है।

बदलते मौसम और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के बीच भविष्य में ऐसी घटनाओं के जोखिम को कम करने के लिए केवल राहत और बचाव व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए खतरे वाले क्षेत्रों की लगातार निगरानी और पहले से तैयारी जरूरी होगी।

सैटेलाइट निगरानी और रियल टाइम अलर्ट जरूरी

हिमालय में आपदा जोखिम को कम करने के लिए उपग्रह निगरानी, रियल-टाइम चेतावनी प्रणाली, जोखिम मानचित्रण, निकासी अभ्यास और मजबूत बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देनी होगी।

समय रहते चेतावनी मिलने पर संवेदनशील क्षेत्रों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन, मौसम विभाग, वैज्ञानिक संस्थानों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल भी महत्वपूर्ण होगा।

चक्रवात और सुनामी चेतावनी प्रणाली बनीं उदाहरण

भारत ने मौसम संबंधी आपदाओं की पूर्व चेतावनी के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण क्षमता विकसित की है। भारत मौसम विज्ञान विभाग की चक्रवात चेतावनी प्रणाली के कारण कई मौकों पर लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद मिली है।

इसी तरह वर्ष 2004 की सुनामी के बाद स्थापित भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली भी समुद्री आपदाओं के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

अब चुनौती यह है कि ऐसी ही आधुनिक और समयबद्ध चेतावनी व्यवस्था को हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते GLOF, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम के अनुरूप और मजबूत किया जाए। तभी आपदाओं में ‘शून्य मृत्यु’ के लक्ष्य की दिशा में ठोस प्रगति संभव होगी।

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