कांग्रेस ने गुरदासपुर से शुरू किया ‘मनरेगा बचाओ संग्राम : ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की लड़ाई का ऐलान

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गुरदासपुर : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पंजाब के गुरदासपुर से ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ की शुरुआत करते हुए ग्रामीण रोजगार अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा की रक्षा के लिए एक बड़े राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन का ऐलान किया है।  पार्टी ने इसे देशव्यापी संघर्ष बताते हुए आरोप लगाया कि हालिया नीतिगत बदलावों के चलते ग्रामीण मजदूरों के अधिकार और मनरेगा की मूल भावना कमजोर की जा रही है।

ग्रामीण आजीविका की रक्षा के रूप में कांग्रेस का आंदोलन :   कांग्रेस द्वारा गुरदासपुर से ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ शुरू करने का उद्देश्य ग्रामीण रोजगार को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना है। पार्टी नेताओं का कहना है कि Indian National Congress इस अभियान के ज़रिए किसानों, ग्रामीण मज़दूरों और वंचित समुदायों को संगठित करेगी, ताकि Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (मनरेगा) के अधिकार-आधारित स्वरूप की रक्षा की जा सके।

कांग्रेस का दावा है कि मनरेगा ने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी देकर आर्थिक संकट के समय सुरक्षा कवच का काम किया है। पार्टी का आरोप है कि हालिया बदलावों और नए ढांचों के ज़रिए इस कानून की अनिवार्यता को कमजोर किया जा रहा है, जिससे यह अधिकार के बजाय विवेकाधीन कल्याण योजना बनता जा रहा है।

पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष Amarinder Singh Raja Warring ने इस अभियान को एक जन आंदोलन बताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का लक्ष्य सिर्फ़ प्रदर्शन नहीं, बल्कि गांव-गांव जाकर मज़दूरों से संवाद करना, उनकी समस्याएं सुनना और उन्हें यह समझाना है कि मनरेगा में बदलाव उनके रोज़मर्रा के जीवन को कैसे प्रभावित कर सकते हैं। उनके अनुसार, गुरदासपुर जैसे ग्रामीण बहुल ज़िले से शुरुआत इस आंदोलन को ज़मीनी मजबूती देती है।

कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि मनरेगा की मूल आत्मा उसकी कानूनी जवाबदेही थी-जहां काम न मिलने पर मज़दूर मुआवज़े का हकदार होता था। पार्टी का कहना है कि इस ढांचे को कमजोर करना सीधे तौर पर ग्रामीण श्रमिकों की सौदेबाज़ी शक्ति और गरिमा पर असर डालता है।

अभियान के तहत रैलियां, ब्लॉक और गांव स्तर की बैठकें, जॉब कार्ड धारकों से संवाद और बूथ स्तर पर संगठनात्मक गतिविधियां चलाई जाएंगी। पार्टी का फोकस देरी से मिलने वाली मज़दूरी, कम होते काम के दिन और फंड आवंटन जैसे मुद्दों पर रहेगा। कांग्रेस का मानना है कि रोज़गार और सम्मान की लड़ाई के रूप में इस मुद्दे को पेश कर वह व्यापक समर्थन जुटा सकती है।

पंजाब के कांग्रेस प्रभारी और पूर्व छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री Bhupesh Baghel की भूमिका भी इस अभियान में अहम मानी जा रही है। ग्रामीण कल्याण योजनाओं के समर्थक माने जाने वाले बघेल की मौजूदगी से आंदोलन को संगठनात्मक ताकत और नीतिगत विश्वसनीयता मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

राजनीतिक बहस, सरकार का पक्ष और व्यापक प्रभाव

‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ की शुरुआत के साथ ही ग्रामीण रोजगार नीति को लेकर राजनीतिक बहस तेज़ हो गई है। जहां कांग्रेस इसे गरीब और मज़दूर विरोधी बदलावों के खिलाफ संघर्ष बता रही है, वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि सुधारों का उद्देश्य योजना को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और टिकाऊ बनाना है। सरकार समर्थकों का तर्क है कि पहले मनरेगा में भुगतान में देरी, धन के दुरुपयोग और टिकाऊ परिसंपत्तियों की कमी जैसी समस्याएं थीं, जिन्हें सुधारना ज़रूरी था।

कांग्रेस इन दावों को खारिज करते हुए कहती है कि ज़मीनी हकीकत आज भी मज़दूरों की समस्याओं से भरी है। पार्टी का आरोप है कि भुगतान में देरी, कम फंड और सीमित काम के दिनों की समस्या बनी हुई है और इन्हें सुलझाने के बजाय सरकार ने कानून के अधिकार-आधारित स्वरूप को ही कमजोर कर दिया।

यह बहस कल्याण और अधिकार आधारित नीतियों को लेकर वैचारिक टकराव को भी उजागर करती है। कांग्रेस के लिए मनरेगा सामाजिक सुरक्षा का एक केंद्रीय स्तंभ है, जिसने सूखा, मंदी और महामारी जैसे संकटों में ग्रामीण परिवारों को सहारा दिया। ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के ज़रिए पार्टी इस विरासत को फिर से सामने लाकर खुद को सामाजिक सुरक्षा की प्रमुख आवाज़ के रूप में स्थापित करना चाहती है।

राजनीतिक दृष्टि से यह अभियान कांग्रेस का ग्रामीण आधार मज़बूत करने और ज़मीनी संगठन को सक्रिय करने का प्रयास भी माना जा रहा है। पंजाब में पार्टी इसे एक परीक्षण के रूप में देख रही है, जहां रोजगार और आजीविका जैसे मुद्दों के ज़रिए वह व्यापक जनसमर्थन जुटाने की कोशिश करेगी।

आंदोलन के अगले चरणों में राज्य से बाहर भी विस्तार की योजना है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह संघर्ष अंततः एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लेगा, जिसमें अलग-अलग राज्यों की ग्रामीण समस्याओं को एक साझा मंच पर लाया जाएगा। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पार्टी किस हद तक निरंतर जनसंपर्क और संगठनात्मक अनुशासन बनाए रख पाती है।

गुरदासपुर से हुई शुरुआत ने फिलहाल इतना तो तय कर दिया है कि मनरेगा और ग्रामीण रोजगार की बहस एक बार फिर राष्ट्रीय एजेंडा पर लौट आई है। यह अभियान नीति में बदलाव लाता है या मुख्य रूप से राजनीतिक दबाव का माध्यम बनता है-यह आने वाले हफ्तों में स्पष्ट होगा। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए मनरेगा आज भी रोज़गार, सम्मान और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और अहम मुद्दा बना हुआ है।

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