कानूनी अधिकारों के लिए अदालत जाना पत्नी की ओर से मानसिक क्रूरता नहीं: हिमाचल हाईकोर्ट

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एएम नाथ / रोहित जसवाल।  शिमला, 29 सितंबर। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि पत्नी अपने और बच्चे के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रास्ता अपनाती है, तो केवल इस आधार पर इसे पति के प्रति मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने मंडी फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की ओर से क्रूरता और परित्याग के आधार पर दायर तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी।

पति ने दलील दी थी कि पत्नी उसके साथ नहीं रह रही थी और उसने उसके खिलाफ धारा 125 के तहत भरण-पोषण तथा घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मामले दर्ज कराए थे। पति ने इन मुकदमों को झूठा बताते हुए इन्हें मानसिक क्रूरता का आधार बताया था। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

भरण-पोषण और घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत मांगना अधिकार

हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा भरण-पोषण की मांग करना और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत राहत के लिए अदालत का रुख करना उसका वैधानिक अधिकार है। महज कानूनी उपचार अपनाने को पति के प्रति मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि जब सक्षम अदालत पत्नी की ओर से मांगी गई राहत को उचित ठहराती है, तो बाद में पति द्वारा इन मुकदमों को झूठा बताना अपने आप में उन्हें मानसिक क्रूरता साबित नहीं करता।

बेटे की जन्मतिथि तक नहीं बता पाया पति

सुनवाई के दौरान पति ने जिरह में स्वीकार किया कि उसे अपने बेटे की जन्मतिथि तक मालूम नहीं थी। हाईकोर्ट ने इस तथ्य को बच्चे के प्रति उसकी उदासीनता और पितृ दायित्वों के निर्वहन से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा।

अदालत ने यह भी पाया कि पत्नी को वापस वैवाहिक घर लाने के लिए पति ने पंचायत, गांव के बुजुर्गों या किसी सम्मानित व्यक्ति की मदद लेने का प्रयास नहीं किया। उसने दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए भी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की थी।

पत्नी ने मारपीट और दुर्व्यवहार के लगाए थे आरोप

पत्नी का कहना था कि पति उसके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार करता था, जिसके कारण उसे मायके में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। हाईकोर्ट ने मामले के उपलब्ध तथ्यों के आधार पर माना कि पत्नी के अलग रहने के पीछे पति के दुर्व्यवहार और शारीरिक हिंसा की परिस्थितियां थीं। ऐसी स्थिति में पति केवल परित्याग का आरोप लगाकर तलाक का हकदार नहीं बनता।

2015 में हुई थी शादी

रिकॉर्ड के अनुसार दोनों की शादी 19 अप्रैल 2015 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। दंपती का एक बेटा है। शादी के समय पत्नी चंडीगढ़ में जीएनएम की ट्रेनिंग कर रही थी। पति का आरोप था कि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद पत्नी उसके साथ रहने के बजाय अधिकतर समय मायके में रहती थी और विवाद करती थी।

दूसरी ओर, पत्नी ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि पति की मारपीट और प्रताड़ना के कारण उसे मायके में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।

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