भगवान राम की वनवास कथा व भरत चरित्र सुनकर अश्रुधारा नहीं रोक पाए श्रद्धालु

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श्री राम कथा के आठवें दिन राजन जी महाराज के मुखारविंद से कथा सुनकर मंत्रमुग्ध हुए श्रद्धालु

होशियारपुर /दलजीत अज्नोहा : श्री बड़े हुनमान जी सेवक संस्था होशियारपुर की तरफ से चेयरमैन व कथा आयोजक पूर्व मेयर शिव सूद एवं प्रधान राकेश सूरी की अगुवाई में करवाई जा रही श्री राम कथा के आठवें दिन की शुरुआत कथा व्यास राजन जी महाराज ने लोकाधिरामम, रणरंगधीरम, राजीवनेत्रम, रघुवंश नाथम, कारुणयरुपम, करुणाकरंतम, श्रीराम चंद्रम, शरणम प्रपदः, कर्पूगौरम, करुणा वतारम, संसारम, भुजगेन्द्रहारम, सदावसंतम, हृदयारविंदे भवम भवानी सहितम नमामी महामंत्र व सीता राम धुनि से की। उन्होंने बताया कि गोसवामी जी कहते हैं राम लखन सीता सहित सोहत परनानिकेत, जिमि बासववस अमारपुर सचिजयंत समेत अर्थात भगवान राम घासफूस की कुटिया में राम जी इस प्रकार लग रहे हैं जैस मानीए देवलोक में देवराज इंद्र अपनी पत्नी मां सचि तथा पुत्र जयंत के साथ रहते हों, उसी प्रकार भगवान इस कुटि में सुशोभित हो रहे हैं। यह सुनने में सहज है, लेकिन रहने में बड़ा कठिन है। वन में भी रहने के बाद कोई जीवन में आनंद बना के रख सकता है, यह बड़ी बात है। मेरे राघव जी कुटिया में भी आनंद में है, यही मेरे राघव जी हैं।

उन्होंने भजन, तेरी मर्जी का मैं हूं गुलाम, ओ मेरे अलबेले राम, मैं हार गया अपनी अकल लगा के, अब अपना संभालो इंतजाम, ओ मेरे अलबेले राम, भजन से भगवान की महिमा गाई। भजन जिंदगी की डोर सौंप हाथ दीनानाथ के, महलों में राखे चाहे झोंपड़ी में वास दे, सीता राम सीता राम कहिए, जाहि विधि राखि राम ताहि विधि रहिए के माध्यम से नाम की महिमा बताई और उसकी रजा में राजी रहने का आह्वान किया।

राजन जी ने जहां भगवान के वनवास की कथा कही वहीं उन्होंने अयोध्या में भगवान के जाने के बाद क्या हालात बने का भी वर्णन किया। उन्होंने बताया कि राम जी ने वनवास को स्वीकार कर लिया और वह आनंद में हैं तथा इसी वनवास को चक्रवति महाराज दशरथ जी स्वीकार नहीं कर पाए। जब सुमंत जी वापिस अयोध्या पहुंचे तो राम जी के अयोध्या से जाने के बाद और सुमंत जी के वापिस आने के बाद वह छठी रात्रि थी, तो महाराज ने सोचा राम जी नहीं आए और उन्होंने कहा कि उनका राम के प्रति प्रेम झूठा है और यह कैसा प्रेम है। चक्रवति जी ने 6 बार राम राम बोला और प्राण त्याग दिए। इसके बाद इसकी सूचना भरत जी को दी गई जो अपने ननिहाल गए थे। भरत जब अयोध्या पहुंचे तो उन्हें मां कैकेई ने बताया कि तुम्हारे ननिहाल जाने के बाद यहां क्या हुआ। लेकिन जब उन्हें पता चला कि पिता जी नहीं रहे तो वह निढाल हो गए और जब उन्हें पता चला कि भईया राम माता सीता व भाई लक्ष्मण के साथ वनवास चले गए तो भरत मूर्छित हो गए। इसके बाद वह मां कौशल्या के कक्ष में जाते हैं और माता से अपने अपराध की क्षमा मांगते हैं और कहते हैं कि वह इस धरा के सबसे अभागे हैं जिनके कारण भईया राम को वनवास जाना पड़ा। इस पर माता कौशल्या कहती हैं कि इस धरा पर सबकुछ फल्ट हो सकता है लेकिन उन्हें विश्वास है कि उनका भरत कभी अपने भाई का अहित नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्होंने अपने पिता की पार्थिव देह के दर्शन किए और उनका अंतिम संस्कार किया और अन्य संस्कार पूरे किए। भरत प्रसंग और चरित्र सुनकर श्रद्धालुओं के अश्रुधारा बहने लगी और हर कोई भाईयों के प्रेम की गंगा में डूब गया। भरत जी कहते हैं कि गुरु जी जिस भरत के नाम मात्र से इतना बड़ा अनर्थ हो गया, अगर मैं राजा बन गया तो यह धरती फटकर धरातन में चली जाएगी। उन्होंने कहा कि गुरु जी प्रातःकाल मैं भईया के पास जा रहा हूं और अगर किसी ने उनके साथ जाना है तो चल सकता है। भरत जी कहते हैं यदपि मैं अपराधी हूं और उन्हें विश्वास है कि जब भईया राम उन्हें अपने सनमुख देखेंगे तो वह उन्हें क्षमा कर देंगे। अयोध्या नगरी ने जब यह सुना कि वह चित्रकूट जा रहे हैं तो सभी उनकी जय-जयकार करने लगे। रथ पर गुरुदेव को बिठाया और पालकियों में माताओं को बिठाया और भरत जी प्रजा के साथ चित्रकूट जाने लगे।

भरत चले चित्रकूट राम को मनाने…, के माध्यम से भरत जी के चित्रकूट जाने की कथा का वख्यान किया। जब भरत जी चित्रकूट पहुंचे तो भरत की पुकार लक्ष्मण जी ने सुन लिया और उन्होंने राम जी को बताया कि भरत उन्हें प्रणाम कर रहे हैं। इता सुनते ही राम जी भरत की ओर दौड़ते हैं। भरत उन्हें दण्डवत प्रणाम करते हैं और राम जी उन्हें बल लगाकर उठाते हैं, क्योंकि वह उठ नहीं रहे हैं। भरत जी से राम जी पूछते हैं कि आप उठ क्यों रहे हो तो भरत जी कहते हैं कि इस लायक नहीं कि आप मेरा मुख देखें, राम जी कहते हैं कि अगर तुम यही चाहते हो तो मैं तुम्हारा मुख नहीं देखूंगा लेकिन गले तो लगो। इस पर भरत जी को राम जी उठाकर गले से लगा लिए और देखिए भगवान ने उनका मुख तक नहीं देखा। दोनों भाई गले मिलकर बहुत रोए। राजन जी बताते हैं कि जब दोनों भाईयों ने एक दूसरे को गले लगाया तो उस समय जो नीचे पत्थर थे वह भी पिघल गए थे और वह पिघले हुए पत्थर आज भी चित्रकूट में मौजूद हैं। राजन जी ने बताया कि भरत जी, गुरुजी एवं अयोध्यावासियों ने भगवान राम को वापिस जाने को कहा तो वह नहीं मानें तो गुरुजी ने कहा कि अयोध्या के राजा राम ही रहेंगे। सभी ने उनकी बात मान ली। लेकिन जब सभी वापिस जाने लगे तो भरत जी ने भगवान राम की चरणपादुकें उठा लीं कि उनकी चरणपादुकाएं ही सिहांसन पर विराजमान रहेंगी। इस कथा के बाद राजन जी ने सुमंत द्वारा माता सीता के पैर में चोंच मारने और भगवान राम द्वारा उसके पीछे कुशा का ब्रमास्त्र छोड़े जाने की कथा सुनाई कि भगवान की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। इस दौरान उन्होंने भजन, राम चरण चित लाई रे, भजो राधे गोविंदा, राधे गोविंदा भजो माधव मुकंदा, भक्तन के सुखदायी रे, भजो राधे गोविंदा भजन से उपस्थिति को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसी दौरान उन्होंने निशाचरों के दमन की लीला का वर्णन करते हुए बताया कि किस प्रकार भगवान राम आगे की लीला प्रारंभ करते हैं। इसके बाद उन्होंने भगवान राम के शबरी माता के आश्रम में जाने की कथा का बहुत ही मार्मिक और सुन्दर ढंग से वर्णन किया तथा माता द्वारा चख कर लाए गए मीठे-मीठे फलों का स्वाद चखा तथा माता के आग्रह पर भगवान उन्हें नवदा भक्ति का ज्ञान देते हैं और माता के बताने पर सुग्रीव से मिलने के लिए आगे बढ़ जाते हैं। इसके बाद ऋषि मुनियों से मिलने के उपरांत माता सीता हरण और भगवान द्वारा उनकी खोज की कथा का उन्होंने वर्णन किया।

इस मौके पर महापुरुषों में स्नेहमयी मां स्नेह अमृतानंद जी भृगु शास्त्री, महंत रमिंदर दास जी महाराज डेरा बाबा चरण शाह बहादुरपुर तथा साध्वी सुश्री भुवनेश्वरी देवी जी ने विशेष तौर से पहुंचकर कथा श्रवण की और श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान किया।

इस मौके पर सकुम गुप्ता, राजीव बजाज, आनंद प्रकाश गुप्ता, प्रेम सिंह राजपुरोहित, तिलक राज गुप्ता, राकेश भार्गव, हरीश मोहन पराशर, यामिनी गोमर, पार्षद मीना शर्मा, सुनील दत्त पराशर, पार्षद अशोक मेहरा, पवन जंदल, नगर निगम के एसई सतीश सैनी, अंकुर गुप्ता, मदन लाल, प्रिंस गुम्बर, सर्वदयाल व सोनू आदि ने भी महाराज के दर्शन किए व कथा श्रवण की।

इस मौक पर मुख्य यजमान व्रिजेश चंद्र विजय व प्रभा रश्मि के अलावा दैनिक यजमानों में आनंद खुराना व सुकृति खुराना, राकेश सूरी व सुचेता सूरी, राहुल सूरी, जतिन सिंह व साक्षी मेहता, राजेश गुप्ता व किरण गुप्ता, विनोद सहगल व सुदेश सहगल, विवेक सहगल व श्रुति सहगल, कुणाल चतरथ व प्रिया चतरथ, काइशा, प्रेम शर्मा (भीम स्वीट्स) व पूनम शर्मा, अंकित अग्रवाल व ग्रीष्मा अग्रवाल, ईशांत भाटिया व शिवानी भाटिया, जीवन लुबाना व शोभा, मुनीश तथा ज्योति ने पूजन किया और महाराज जी से आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर अन्य के अलावा संस्था की तरफ से महामंत्री प्रदीप हांडा, प्रचार सचिव अश्वनी शर्मा, कोषाध्यक्ष विपिन वालिया, प्रशांत कैंथ, कपिल हांडा, अनमोल सूद, गौरव शर्मा, शुभांकर शर्मा, अंकुश, अशोक सेठी, पं. दीपक शास्त्री, पंकज बेदी, मनी गोगिया, पंडित दर्शन लाल काका सहित अन्य सदस्यगण एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण की।

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