मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं मां त्रोकड़ावाली ; पत्थर फाड़कर प्रकट हुई थी मां की दिव्य मूर्ति

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हर वर्ष भाद्रपद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को होता है भव्य जाग का आयोजन
एएम नाथ । मंडी।  हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है। यहाँ हर पर्वत, हर घाटी और हर क्षेत्र में कोई न कोई देवता या देवी विराजमान हैं। मंडी जिले की मंडी-कोटली मार्ग पर स्थित श्री त्रोकड़ाधाम भी ऐसा ही एक पावन स्थान है, जहाँ माँ त्रोकड़ावाली की अनूठी महिमा, भक्तों की अटूट श्रद्धा और अद्भुत चमत्कारों की कहानियाँ प्रचलित हैं। यह धाम केवल पूजा-अर्चना स्थल नहीं, बल्कि भक्ति, साहस और तपस्या की अमर पाठशाला है। यहाँ आने वाला हर भक्त माँ की दिव्य छत्रछाया को अनुभव करता है। यही कारण है कि यह धाम आज श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है।
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तुंगल घाटी की सुरम्य वादियों में बसा त्रोकड़ा धाम
आस्था और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि मां अंबिका माता नाऊ-पनाऊ की कृपा से दुर्गा रूप में एक पत्थर से प्रकट हुईं और उनके एक अनोखे भक्त और देवी मां के अद्भुत आशीर्वाद से इस धाम की स्थापना हुई।
उत्पत्ति की कथा
माँ त्रोकड़ा वाली का प्राकट्य कब और कैसे हुआ, इस बारे में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार, सैकड़ों वर्ष पहले एक साधक ने इस स्थान पर गहन तपस्या की थी। माँ ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और आशीर्वाद दिया कि यह भूमि भविष्य में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनेगी। समय के साथ यहाँ माँ की महिमा का प्रसार हुआ और धीरे-धीरे यह स्थल एक सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
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भक्तों का मानना है कि यहाँ माँ की पूजा-अर्चना करने से संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
त्रोकड़ा धाम के इतिहास का ताना-बाना मां दुर्गे और उनके सच्चे सेवक श्री लाभ सिंह धरवाल से भी जुड़ा है। गांव साई, तहसील कोटली, जिला मंडी निवासी लाभ सिंह जी का जीवन कठिन परिश्रम, तपस्या और मां के प्रति अटूट आस्था का उदाहरण है। बकौल लाभ सिंह त्रोकड़नाला में डंगे के निर्माण कार्य के दौरान एक भारी पत्थर किसी से हिलाया नहीं जा रहा था। जब ठेकेदार ने उसे तोड़ने के निर्देश दिए तो यह दो भागों में टूटा और बीच से माता की भव्य मूर्ति निकली। यह मूर्ति आज भी मंदिर में स्थापित है।
जब भक्त ने ली मां की परीक्षा
माता जब त्रोकड़ नाला में प्रकट हुई तो लोगों को विश्वास दिलाने के लिए भक्त लाभ सिंह ने मां से अरदास की कि माता अगर आप सचमुच में यहां स्थाई रूप से प्रकट हो गई हैं तो मैं तभी मानूंगा अगर आप आधे घंटे में बारिश करोगी। आसमान साफ था, 40-50 लोगों के सामने मैंने बारिश के लिए अरदास तो लगा दी लेकिन, मन थोड़ा आशंकित था। पूजा आरती करके सभी अपने घरों को निकल गए। जैसे ही में घर पहुंचा साफ आसमान में बादल छाए, अचानक बिजली चमकी और बरसात शुरू हो गई।
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त्रोकड़ा नाला से त्रोकड़ा धाम का नाम कैसे पड़ा
त्रोकड़ा नाला से त्रोकड़ा धाम नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि धामों से चीरकाल से ही मनुष्य को, अपनी इच्छाओं की पूर्ति से लेकर, गति व मोक्ष तक प्राप्त होता है। इसलिए महामायी त्रोकड़ा की कृपा से अब वहीं पर ही पितरों का उद्धार, संतान प्राप्ति, भूत-प्रेत साया को दूर करना, नवग्रहों की शान्ति संबंधी अनुष्ठान किए जाते हैं। यहां नशीले पदार्थ पूरी तरह से त्याज्य हैं। इसके अलावा किसी भी प्रकार के पूछ-प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं। विशेष बात यह कि उनका विवरण लिखित रूप में रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। यहां आज प्राणी, पशु, पक्षी की बलि प्रथा से हटकर केवल एक ही नारियल से सभी कार्यों को सफल किया जाता है। इसके बहुत से प्रमाण जो मन्दिर में हस्त लिखित रजिस्टर में दिनांक सहित दर्ज किये जाते हैं।
पुजारी लाभ सिंह की भक्ति
लाभ सिंह जी ने 1960 के दशक से मां की भक्ति आरंभ की। अंबिका माता नाउ-पनाऊ के अनन्य भक्त कई वर्षों तक कठिन परीक्षाओं से गुजरे, कभी बीमारी, कभी आर्थिक तंगी, तो कभी पारिवारिक संकट। फिर भी वे मां के दरबार तक पहुँचने के लिए लहूलुहान पैरों से भी पैदल यात्रा करते।
मां ने उन्हें स्वप्नों और दृष्टांतों में दर्शन दिए। एक बार सपने में उन्होंने देखा कि भव्य मंदिर में मां दुर्गा सिंह (शेर) पर विराजमान हैं। मां ने संकेत दिया कि यही उनका धाम होगा।
मंदिर निर्माण की चुनौतियाँ
धाम की स्थापना आसान नहीं थी। पैसों की कमी, आलोचनाएँ और प्रशासनिक दिक्कतों ने मार्ग रोका। फिर भी पुजारी जी ने हिम्मत नहीं हारी। धीरे-धीरे भक्तों का सहयोग मिला और मंदिर निर्माण संभव हुआ। मंदिर में हर वर्ष भाद्रपद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को जाग होती है जिसमें माता के गूर देववाणी करते हैं। श्रद्धालुओं की ओर से भजन-कीर्तन व भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।
आज का त्रोकड़ा धाम
आज त्रोकड़ा धाम हिमाचल प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहाँ नियमित रूप से भजन-कीर्तन, भंडारे और धार्मिक आयोजन होते हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते हैं। धाम के प्रांगण में प्रवेश करते ही एक अलौकिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। श्री त्रोकड़ाधाम केवल एक मंदिर या धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह भक्ति, त्याग और दिव्यता का जीवंत प्रतीक है। यहाँ की हर ईंट और हर पत्थर माँ की महिमा के साक्षी हैं। यह धाम हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति किसी बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास में निहित है।
भक्त व भगवान के सच्चे रिश्ते का सजीव उदाहरण
त्रोकड़ा धाम आज न केवल श्रद्धा का प्रतीक बना है, बल्कि भक्त और भगवान के रिश्ते का सजीव उदाहरण भी है। यहां आकर हर भक्त को मां के अलौकिक दर्शनों के साथ ही उनका आशीष प्राप्त होता है।
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