मुफ्त मेडिकल सर्विस प्रदान करना राज्य का काम : हाईकोर्ट ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ को लगाई कड़ी फटकार

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चंडीगड़ । पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने बुधवार को जिला अस्पतालों को एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनों जैसी बेसिक सुविधाओं से लैस करने में विफल रहने के लिए पंजाब सरकार की खिंचाई की। पीठ ने कहा कि मुफ्त चिकित्सा सेवा प्रदान करना राज्य का एक संप्रभु कार्य है।

मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की पीठ ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ को हलफनामे दाखिल कर अपनी स्वास्थ्य सेवा संबंधी बुनियादी ढांचा नीतियों और ऐसे आवश्यक उपकरण न खरीद पाने के कारणों को बताने का निर्देश दिया। अदालत एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी, जो शुरू में पंजाब के मलेरकोटला स्थित सिविल अस्पताल की स्थिति पर केंद्रित थी। पीठ ने इस मुद्दे को अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व का बताते हुए इसका दायरा बढ़ाकर हरियाणा और चंडीगढ़ को भी इसमें शामिल कर लिया।

मुख्य न्यायाधीश नागू ने सार्वजनिक संस्थानों की समग्र गिरावट की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा, “एक समय था जब सरकारी स्कूल फलते-फूलते थे। अब हम निजी स्कूलों के पीछे पड़ गए हैं।”

पंजाब सरकार ने कोर्ट को दी ये सफाई

14 जुलाई को दाखिल एक हलफनामे में, पंजाब के प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण), कुमार राहुल ने बताया कि मलेरकोटला के सिविल अस्पताल में 20 सामान्य चिकित्सा अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। इनमें 11 नए नियुक्त डॉक्टर, 4 नियुक्ति की प्रतीक्षा में और 5 स्थानांतरित डॉक्टर शामिल हैं। 8 जुलाई को नेत्र रोग, रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी सहित 5 विशेषज्ञों की भी नियुक्ति की गई। हालांकि, स्त्री रोग विशेषज्ञों के दो पद रिक्त रहे।

सामान्य चिकित्सा अधिकारियों के 1000 पदों को भरने के लिए भर्ती अभियान

हलफनामे में आगे कहा गया है कि एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनों के लिए 27 मई को ई-टेंडर जारी किया गया था लेकिन कोई बोली नहीं मिली। विभाग ने टेंडर दोबारा जारी करने की योजना बनाई है। सामान्य चिकित्सा अधिकारियों के 1,000 पदों को भरने के लिए एक बड़ा भर्ती अभियान भी अप्रैल में शुरू हो गया था। हलफनामे के अनुसार, डोक्यूमेंट वेरिफिकेशन 4 जुलाई तक पूरा हो गया था और मेरिट लिस्ट तैयार की जा रही थी। अदालत ने पंजाब सरकार से यह भी पूछा कि वह दूसरे अस्पतालों से डॉक्टरों के तबादले से पैदा हुई नई रिक्तियों को कैसे पूरा करेगी। अगली सुनवाई 19 अगस्त को निर्धारित है।

यह जनहित याचिका 2024 में 26 वर्षीय अधिवक्ता भीष्म किंगर द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने मलेरकोटला सिविल अस्पताल की स्थिति पर चिंता जताई थी। उस समय, 130 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में केवल चार डॉक्टर-बाल रोग, हड्डी रोग, ईएनटी और त्वचा रोग-और 17 नर्सें थीं। 13 प्रमुख पद-एक स्त्री रोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट, रक्त अधिकारी और 10 आपातकालीन चिकित्सा अधिकारी खाली पड़े थे।

अस्पताल में एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनों का अभाव

22 नवंबर, 2024 को, चार डॉक्टरों में से केवल दो ही उपलब्ध थे, क्योंकि बाकी दो रात की शिफ्ट के बाद ड्यूटी पर नहीं थे। अस्पताल में एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनों जैसे ज़रूरी उपकरणों का अभाव था, जिससे गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों को कहीं और रेफर करना पड़ता था और इलाज में देरी होती थी।

नवंबर 2024 में, किंगर ने एक आरटीआई आवेदन दायर किया, जिसमें इन गंभीर कमियों की पुष्टि हुई। 16 नवंबर को अधिकारियों को भेजे गए उनके कानूनी नोटिस का कोई जवाब नहीं मिला, जिसके बाद उन्हें आर्टिकल 226 के तहत उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा।

याचिका में रिक्त पदों को भरने, बुनियादी ढाँचे को उन्नत करने और पंजाब के सभी सिविल अस्पतालों का निरीक्षण करने के लिए एक स्वतंत्र आयोग नियुक्त करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। इसमें स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में राज्य की जवाबदेही को अनिवार्य बनाने वाले प्रासंगिक कानून का भी हवाला दिया गया था। उस समय मलेरकोटला में हुए जन विरोध प्रदर्शनों ने स्थिति की गंभीरता को और भी स्पष्ट कर दिया था।

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