दूरदराज के स्कूलों की बदहाल तस्वीर: सवाल सिर्फ भवन का नहीं, बच्चों के भविष्य का है।

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तीर्थन घाटी में कई स्कूल भवन खस्ताहाल, मिडल स्कूल नाहीं के बच्चे टीन के अस्थायी शैड में पढ़ने को मजबूर।

बेहतर शिक्षा के लिए गांव छोड़ने को मजबूर हो रहे अभिभावक।

तीर्थन घाटी गुशैनी/ बंजार(परस राम भारती):- शिक्षा को बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव माना जाता है, लेकिन तीर्थन घाटी के दूरदराज क्षेत्रों में कई स्कूल भवनों की खराब हालत शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है। ग्राम पंचायत पेखड़ी के राजकीय माध्यमिक विद्यालय नाहीं का भवन असुरक्षित घोषित होने के बाद यहां पढ़ने वाले 22 विद्यार्थियों के लिए टीन की चादरों से अस्थायी व्यवस्था की गई है। वहीं पेखड़ी-1 और पेखड़ी-2 प्राथमिक स्कूलों के भवन भी खस्ताहाल बताए जा रहे हैं।

स्कूल प्रबंधन समिति के प्रधान सुंदर सिंह ने बताया कि राजकीय माध्यमिक विद्यालय नाहीं वर्ष 2006 में प्राथमिक विद्यालय से स्तरोन्नत होकर मिडल स्कूल बना था। वर्ष 2016 में स्कूल के लिए भवन का निर्माण किया गया, लेकिन आज यह भवन खंडहर में तब्दील हो चुका है। भवन को असुरक्षित घोषित किया जा चुका है और इसकी स्थिति के बारे में शिक्षा विभाग कुल्लू को पत्राचार भी किया गया है। इसके बावजूद अभी तक भवन को हटाने और नए भवन की व्यवस्था को लेकर धरातल पर ठोस काम शुरू नहीं हुआ है। इन्होंने बताया कि वर्तमान में 21 बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए चार टीन के शेड बनाए गए है जिसमें से तीन में क्लास चलती है जबकि एक शेड में कार्यालय संचालित किया जा रहा है।

पेखड़ी-1 और पेखड़ी-2 प्राइमरी स्कूलों की हालत भी चिंताजनक

स्थानीय लोगों यज्ञ चन्द जुफरा, नरेश सोनी, संजय, कर्म चन्द, पंचम
राम लाल, तारा चन्द, हुकम राम, रमेश आदि का कहना है कि पेखड़ी पंचायत के राजकीय प्राथमिक विद्यालय पेखड़ी-1 और पेखड़ी-2 के भवनों की स्थिति भी खराब बताई जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई के लिए पर्याप्त और सुरक्षित जगह नहीं मिल पा रही है। खराब भवनों के कारण अभिभावकों को अपने बच्चों की शिक्षा के लिए गांव से बाहर भेजने को मजबूर होना पड़ रहा है।

स्थानीय निवासी गुमत शलाठ उर्फ रवि ने कहा कि स्कूलों की समस्याओं को लेकर समय रहते आवाज न उठाने का खामियाजा आज बच्चों और उनके अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि अच्छी शिक्षा के लिए कई अभिभावक अपने बच्चों को लेकर गांव से बाहर बाजारों में किराये के कमरे लेकर रहने को मजबूर हैं। कुछ लोग दिहाड़ी-मजदूरी करके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि अभिभावक और स्थानीय लोग मिलकर स्कूलों की समस्याओं के लिए आवाज उठाएं और एकजुट होकर प्रयास करें तो बच्चों को गांव से बाहर पलायन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आज के समय में बच्चों को अच्छी शिक्षा देना हर परिवार की प्राथमिकता है और इसके लिए सभी को मिलकर प्रयास करना होगा।

समाधान के लिए विभागों के चक्कर काट रहे स्थानीय लोग.

युवा समाजसेवी यज्ञा चंद जुफरा ने बताया कि पिछले महीने वह और उपप्रधान नील चंद नाहीं स्कूल गए थे। उस समय स्कूल में पानी की समस्या चल रही थी, जिसे हल कर दिया गया। इसके बाद बीपीओ कार्यालय बंजार में जानकारी ली गई तो पता चला कि लोक निर्माण विभाग की ओर से सर्वे रिपोर्ट जमा नहीं की गई थी। इसके बाद लोक निर्माण विभाग के कार्यालय में भी संपर्क किया गया। अब सर्वे रिपोर्ट जमा कर दी गई है और कुछ दिनों में भवन को गिराने के आदेश जारी होने की जानकारी मिली है।

स्थानीय निवासी अंजना ठाकुर ने बताया कि पेखड़ी पंचायत के कई और स्कूलों की स्थिति भी खराब है। उन्होंने कहा कि राजकीय प्राथमिक विद्यालय पेखड़ी-2 की हालत और भी चिंताजनक है। स्कूल में एक छोटा कमरा ही अपेक्षाकृत ठीक है, जिसमें कार्यालय के साथ पांचों कक्षाओं के बच्चों के बैठने की व्यवस्था करनी पड़ती है। स्कूल के अन्य दो कमरे भी गिरने की स्थिति में हैं। इन्होंने कहा कि राजकीय प्राथमिक विद्यालय पेखड़ी-1 में भी भवन की स्थिति संतोषजनक नहीं है और सभी कक्षाएं एक ही भवन में चल रही हैं।

विभाग ने कहा- रिपोर्ट भेजी, बजट और मंजूरी मिलते ही शुरू होगा काम

राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय गुशैनी के प्रधानाचार्य के.एल. शर्मा ने बताया कि राजकीय माध्यमिक विद्यालय नाहीं स्कूल भवन का मामला इनके ध्यान में है। इस बारे में एलिमेंट्री शिक्षा विभाग कुल्लू को पत्राचार किया गया है। इन्होंने बताया कि गुशैनी स्कूल भवन निर्माण की सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई है, केवल वन विभाग से एफआरए क्लियरेंस होना बाकी है।

खंड प्राथमिक शिक्षा अधिकारी रमेश भारद्वाज ने बताया कि क्षतिग्रस्त प्राइमरी स्कूल भवनों की रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेज दी गई है। बजट और स्वीकृति मिलते ही निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।

सवाल व्यवस्था पर भी.

दूरदराज क्षेत्रों के स्कूलों की यह स्थिति केवल भवनों की समस्या नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को सुरक्षित और बेहतर शिक्षा का वातावरण कब मिलेगा। यदि स्कूल भवन असुरक्षित हैं और बच्चों को अस्थायी कमरों में पढ़ना पड़ रहा है, तो सरकार और शिक्षा विभाग को इन मामलों को प्राथमिकता के आधार पर देखना होगा। किसी बच्चे का गांव, भौगोलिक दूरी या आर्थिक स्थिति उसके शिक्षा के अधिकार को कम नहीं कर सकती। दूरदराज के बच्चों को भी सुरक्षित भवन, बेहतर सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलना उनका अधिकार है।

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