जस्टिस स्वर्णकांता ने सुना दी खरी-खरी …..9 मार्च को मेरा दिल बैठ गया…’ भरी अदालत में क्या बोले अरविंद केजरीवाल

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दिल्ली हाईकोर्ट में सोमवार को आबकारी नीति मामले में फिर से सुनवाई हुई है. इसमें पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तरफ से दायर उस याचिका पर विचार किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने मामले की सुनवाई कर रहीं न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा को केस से अलग करने की मांग की है।

मामले की सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल ने खुद अपनी पैरवी करने का फैसला किया. उन्होंने अदालत को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें बोलने की अनुमति देने के लिए वे आभारी हैं और वे व्यक्तिगत तौर पर न्यायपालिका तथा जज का बहुत सम्मान करते हैं. इस पर न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने भी जवाब देते हुए कहा कि वह भी उनका सम्मान करती है।

इसके बाद केजरीवाल ने अपनी दलील रखते हुए कहा कि वह आज अदालत में एक आरोपी की तरह खड़े नहीं हैं, क्योंकि उन्हें निचली अदालत से पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है. इस पर अदालत ने उन्हें स्पष्ट किया कि फिलहाल बहस केवल रिक्यूजल यानी जज के खुद को मामले से अलग करने के मुद्दे पर ही की जाए. केजरीवाल ने अदालत से कहा, ‘मैडम, मुझे दो मिनट सुन लीजिए,’ जिस पर बेंच ने उन्हें अपनी बात रखने की अनुमति दी।

केजरीवाल ने फिर कहा कि जब 9 मार्च का ऑर्डर आया तो मेरा दिल बैठ गया. उन्होंने कहा, ‘उस दिन कोर्ट में सीबीआई के अलावा कोई मौजूद नहीं था. उन्होंने आरोप लगाया कि बिना अन्य पक्षों को सुने, बिना जवाब लिए, अदालत ने एक्स-पार्टी तरीके से यह टिप्पणी कर दी कि ट्रायल कोर्ट का आदेश प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण है. केजरीवाल ने कहा कि निचली अदालत ने पूरे दिन सुनवाई कर और करीब 40,000 पन्नों के दस्तावेजों का अध्ययन कर फैसला दिया था, जबकि हाईकोर्ट ने महज कुछ मिनटों की सुनवाई के बाद उसे गलत ठहरा दिया। इससे पहले, केजरीवाल अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल के साथ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचे थे. यह मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें केजरीवाल समेत अन्य आरोपियों ने अनुरोध किया है कि सीबीआई की अपील पर सुनवाई कर रहीं न्यायाधीश को इस केस से अलग किया जाए।

इससे पहले 6 अप्रैल को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल की ओर से दायर अर्जी को रिकॉर्ड पर लेते हुए सुनवाई के लिए 13 अप्रैल की तारीख तय की थी. केजरीवाल का कहना है कि उन्हें आशंका है कि इस मामले में उनके साथ निष्पक्ष और तटस्थ सुनवाई नहीं हो सकती, इसलिए न्यायाधीश को इस केस से अलग होना चाहिए। केजरीवाल के अलावा मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक सहित आम आदमी पार्टी के कई नेताओं ने भी इसी तरह की अर्जी दाखिल की है. वहीं, मामले के अन्य आरोपी जैसे विजय नायर और अरुण रामचंद्र पिल्लई ने भी न्यायाधीश को अलग करने की मांग की है ।

गौरतलब है कि 27 फरवरी को निचली अदालत ने आबकारी नीति मामले में केजरीवाल, सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था. अदालत ने सीबीआई की जांच पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उसका मामला पूरी तरह कमजोर और बेबुनियाद है.

इसके बाद सीबीआई ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. 9 मार्च को जस्टिस शर्मा ने इस अपील पर सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी किया था. साथ ही उन्होंने कहा था कि निचली अदालत के कुछ निष्कर्ष प्रथम दृष्टया सही नहीं लगते और उनकी समीक्षा की जरूरत है। इसके अलावा, निचली अदालत द्वारा सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश पर भी हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी।

इस बीच, दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय ने केजरीवाल की उस मांग को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने मामले को किसी अन्य न्यायाधीश को ट्रांसफर करने की अपील की थी. मुख्य न्यायाधीश ने साफ कहा था कि इस मामले से अलग होने का फैसला संबंधित न्यायाधीश को ही करना होगा। वहीं, सीबीआई ने अपने जवाब में केजरीवाल और अन्य आरोपियों की मांग का विरोध किया है. जांच एजेंसी का कहना है कि सिर्फ इस आधार पर कि जस्टिस शर्मा ने अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, उन्हें मामले से अलग करने की मांग नहीं की जा सकती. इससे किसी तरह का वैचारिक पक्षपात साबित नहीं होता।

अब इस पूरे मामले में आज दोपहर होने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा इस केस की सुनवाई जारी रखेंगी या खुद को इससे अलग करेंगी।

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