धर्मराज मंदिर: मान्यता है यहीं होता है कर्मों का लेखा-जोखा : चित्रगुप्त का आसन और ढाई सीढ़ियों को माना जाता है स्वर्ग का द्वार

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चौरासी मंदिर परिसर में धर्मराज की कचहरी को लेकर सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं

एएम नाथ।  भरमौर  । हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का भरमौर सिर्फ मणिमहेश यात्रा और प्राचीन शिवधाम के लिए प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां स्थित चौरासी मंदिर परिसर अपने धार्मिक रहस्यों और लोकमान्यताओं के लिए भी जाना जाता है। परिसर में बना धर्मराज मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।

धार्मिक मान्यता है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा के पाप-पुण्य और कर्मों का लेखा-जोखा धर्मराज की कचहरी में होता है। कर्मों के आधार पर जीव के लिए आगे का निर्णय होता है। हालांकि, इन मान्यताओं का कोई प्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है और मंदिर से जुड़ी बातें मुख्य रूप से धार्मिक आस्था एवं स्थानीय परंपराओं पर आधारित हैं।

सामने बना है चित्रगुप्त का आसन

धर्मराज मंदिर के ठीक सामने चित्रगुप्त का आसन बना हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चित्रगुप्त जीव के कर्मों का लेखा रखने वाले देवता हैं। मंदिर की सीढ़ियों के पास एक गुप्त यंत्र होने की भी मान्यता है, जिसे धर्मराज द्वारा जीव के कर्मों का हिसाब रखने से जोड़ा जाता है।

मंदिर के समीप बनी ढाई सीढ़ियों को स्वर्ग का द्वार माना जाता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच इस स्थान को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं।

‘धर्मराज की कचहरी’ में सवाल-जवाब की मान्यता

धर्मराज मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यता यहां होने वाली कथित ‘कचहरी’ को लेकर है। लोकविश्वास के अनुसार मृत्यु के बाद जीवात्मा के कर्मों का हिसाब यहां होता है।

कुछ सिद्ध पुरुषों द्वारा धर्मराज की कचहरी में होने वाले सवाल-जवाब सुनने का दावा किए जाने की बातें भी स्थानीय परंपराओं में मिलती हैं। हालांकि, ऐसे दावों के प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

टेढ़े शिवलिंग से जुड़ी है मंदिर की कहानी

चौरासी मंदिर परिसर के इतिहास को दसवीं शताब्दी से भी पुराना बताया जाता है। एक स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, धर्मराज मंदिर वाली जगह पर पहले एक टेढ़ा शिवलिंग स्थापित था।

बताया जाता है कि वर्ष 1905 के बाद महाराज कृष्ण गिरि ने यहां साधना शुरू की। कुछ लोगों ने शिवलिंग को सीधा करने के लिए खुदाई की, लेकिन खुदाई का अंत नहीं मिलने की मान्यता के बाद यह प्रयास रोक दिया गया।

इसके बाद महाराज कृष्ण गिरि ने कई महीनों तक मंदिर के बाहर साधना की। धार्मिक परंपरा के अनुसार इसी दौरान उन्हें यहां धर्मराज की कचहरी होने का आभास हुआ। वर्ष 1962 में उनके देहांत के बाद मंदिर के समीप उनकी समाधि बनाई गई।

मणिमहेश यात्रा में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

भरमौर चंबा मुख्यालय से करीब 62 किलोमीटर दूर स्थित है। चौरासी मंदिर परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं से जुड़े मंदिर और धार्मिक प्रतीक मौजूद हैं। मणिमहेश यात्रा के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और धर्मराज मंदिर में भी दर्शन करते हैं।

मंदिर में सुबह, दोपहर और शाम आरती होती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर चारों पहर आरती किए जाने की परंपरा भी बताई जाती है।

कर्मों पर आधारित है धार्मिक संदेश

मंदिर के पुजारियों के अनुसार मानव शरीर नश्वर है और व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार ही स्वर्ग या नरक की प्राप्ति होती है। धर्मराज मंदिर की धार्मिक मान्यता इसी कर्म सिद्धांत से जुड़ी हुई है।

स्थानीय बुजुर्गों के बीच इस स्थान से मृत आत्माओं की आवाजें सुनाई देने जैसी कई लोककथाएं भी प्रचलित रही हैं, लेकिन वर्तमान समय में ऐसी किसी घटना की पुष्टि नहीं हुई है।

धर्मराज मंदिर की खासियत यही है कि यहां इतिहास, लोकविश्वास और धार्मिक आस्था एक-दूसरे से जुड़े नजर आते हैं। यही वजह है कि मणिमहेश यात्रा के दौरान भरमौर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए चौरासी परिसर का यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहता है।

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