प्रशांत किशोर बिहार में क्यों हुए बदहाल ? जन सुराज पार्टी का जादू ना चलने के 5 कारण

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बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा है। शुरुआती रुझान बताते हैं कि पार्टी अपना खाता भी खोलती नहीं दिख रही है।

कभी देश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक रणनीतिकारों में शुमार प्रशांत किशोर ने जन सुराज को एक वैकल्पिक राजनीति की शुरुआत बताया था, लेकिन मतदाता इससे जुड़ते नजर नहीं आए।

जन सुराज ने शुरुआत में 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी, हालांकि अंततः 240 सीटों पर मैदान में उतरी। प्रशांत किशोर तीन साल से अधिक समय से बिहार की धरती पर लगातार जनसंपर्क और पदयात्रा करते रहे। उनका दावा था कि जन सुराज स्थापित सत्ता समीकरणों को चुनौती देगा, लेकिन रुझानों ने इन दावों को ठंडा कर दिया है।

बिहार में क्यों नहीं चला प्रशांत किशोर का जादू?

1. ग्रामीण इलाकों में सीमित पहचान :  बिहार की आबादी का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है, लेकिन जन सुराज की पहुंच वहां पर्याप्त नहीं बन पाई। कई ग्रामीण मतदाताओं को पार्टी का चुनाव चिह्न तक नहीं पता था, जिससे वोट ट्रांसफर कमजोर रहा। 3,500 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा के बाद भी जन जागरूकता पारंपरिक दलों की तुलना में कम रही।

2. संगठन की कमजोर नींव और आंतरिक मतभेद :पार्टी ने मजबूत जमीनी संगठन खड़ा नहीं किया। कई कार्यकर्ताओं को टिकट न मिलने से नाराजगी रही और पैराशूट उम्मीदवारों को प्राथमिकता दिए जाने से मतभेद बढ़े। पूर्व आईपीएस आनंद मिश्रा सहित कई प्रमुख चेहरों का पार्टी छोड़ना इस आंतरिक असंतोष को और उजागर करता है।

. जातीय समीकरणों की चुनौती :  बिहार की राजनीति जातिगत संरचना से संचालित होती है।  जन सुराज शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों के सहारे ‘नई राजनीति’ की पेशकश लेकर आया, लेकिन जातीय गोलबंदी के सामने यह विचार कमजोर पड़ गया। खास तौर पर मुस्लिम वोटर और कई जातियां भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन को अधिक ‘सुरक्षित विकल्प’ मानकर उसके साथ रहीं।

4. उम्मीदवारों पर दबाव और नामांकन वापसी

प्रशांत किशोर ने भाजपा पर उनके उम्मीदवारों को धमकाने और प्रलोभन देने के आरोप लगाए। कई उम्मीदवारों द्वारा नामांकन वापस लेने से पार्टी का मोमेंटम टूट गया और यह संदेश गया कि बड़ी पार्टियों ने नए विकल्प को कमजोर कर दिया।

5. प्रशांत किशोर का खुद चुनाव न लड़ना

पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा होने के बावजूद प्रशांत किशोर ने चुनाव नहीं लड़ा। इससे मतदाताओं में यह प्रश्न बना रहा कि क्या वे पूरी तरह राजनीति में उतरने को लेकर आश्वस्त हैं। पारंपरिक राजनीति में नेता का मैदान में उतरना विश्वसनीयता का प्रतीक माना जाता है, जो यहां अनुपस्थित था।

 

 

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