बसंत पंचमी पर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन

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 होशियारपुर/ दलजीत अजनोहा : दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से स्थानीय आश्रम, गौतम नगर, होशियारपुर में बसंत पंचमी के उपलक्ष्य में एक धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर संस्थान की शिष्या साध्वी मीमांसा भारती जी ने प्रवचन देते हुए कहा कि विद्या, कला और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की वंदना के स्वर पूरी प्रकृति में गुंजायमान हो जाते हैं, जब माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का शुभ पर्व आता है। इसी दिन से बसंत ऋतु का आगमन होता है।
उन्होंने कहा कि प्रकृति हमें यह संदेश देती है कि ‘बसंत’ का अर्थ केवल ऋतु परिवर्तन नहीं, बल्कि ‘बस अंत’ अर्थात बुराइयों का अंत और संस्कार-विहीन शिक्षा का समापन भी होना चाहिए।
आगे साध्वी जी ने बताया कि बसंत पंचमी को ‘विद्या जयंती’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह विद्या की देवी माँ सरस्वती के प्राकट्य का दिवस है। माँ सरस्वती केवल बाहरी ज्ञान की नहीं, बल्कि आत्मिक चेतना की प्रतीक हैं, जो हमारी बुद्धि, प्रज्ञा और मानसिक प्रवृत्तियों को सन्मार्ग दिखाती हैं। यदि कोई उच्च डिग्रियाँ प्राप्त कर भी सच्चे ज्ञान से वंचित है, तो उसे वास्तविक विद्या नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में विद्या और विद्या की देवी माँ सरस्वती को शुद्ध, सत्य और दिव्य रूप में दर्शाया गया है। लेकिन यदि हम आज के पढ़े-लिखे समाज को देखें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा ने उनमें अहंकार और कठोरता भर दी है। कई लोग तानाशाही प्रवृत्ति के हो गए हैं, जिनके स्वभाव में क्रोध, अकड़ और आत्मप्रशंसा का भाव बढ़ गया है। उनके शब्द वाणों की तरह तीखे हो गए हैं, और वे केवल तर्क करने में लगे रहते हैं।
साध्वी जी ने कहा कि यह विद्या का वास्तविक स्वरूप नहीं है। यदि शिक्षा हमें विनम्र, सौम्य और सहृदय नहीं बनाती, तो वह केवल सूचनाओं का भंडार है, सच्ची विद्या नहीं। हमारे शिक्षण संस्थान आज केवल किताबी ज्ञान दे रहे हैं, लेकिन विद्यार्थियों को आत्मबोध और संस्कारों का ज्ञान नहीं दे पा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जब विद्या का वास्तविक जागरण होता है, तो व्यक्ति की प्रकृति और प्रवृत्ति भी सौम्य हो जाती है। उसके व्यवहार में विनम्रता और सहृदयता आ जाती है। यही विद्या का वास्तविक रहस्य है, क्योंकि विद्या केवल मस्तिष्क को नहीं, बल्कि संपूर्ण चेतना को जागृत करती है।
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