चंडीगढ़ : पजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को तीन पुलिसकर्मियों को 1 लाख रुपये प्रत्येक का भुगतान करने का आदेश दिया। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने सोमवार को राजबीर सिंह बराड़ द्वारा दायर अवमानना याचिका को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने इसे परेशान करने वाला मुकदमा बताते हुए उन पर 3 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। न्यायालय ने बराड़ को पंजाब के डीजीपी गौरव यादव सहित उन तीन पुलिस अधिकारियों को 1 लाख रुपये प्रति व्यक्ति का भुगतान करने का निर्देश दिया, जिनके खिलाफ उन्होंने अवमानना याचिका दायर की थी।
जस्टिस सुदीप टी शर्मा को पंजाब पुलिस अधिकारियों द्वारा 30 जुलाई, 2024 के पूर्व डिवीजन बेंच के आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करने का कोई सबूत नहीं मिला। कोर्ट में स्वयं उपस्थित हुए बराड़ ने पंजाब के पुलिस महानिदेशक गौरव यादव और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर जानबूझकर उन निर्देशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था, जिनमें राज्य को ललिता कुमारी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार संज्ञेय अपराधों में एफआईआर दर्ज करने और गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 का सख्ती से पालन करने की आवश्यकता थी।
वहीं, राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता रवनीत एस. जोशी ने एक अनुपालन हलफनामा दायर किया जिसमें दिखाया गया कि 2024 का आदेश विशेष रूप से लिंग निर्धारण मामलों से संबंधित था और फरीदकोट जिले में स्कूल निधि के कथित गबन के बारे में राजबीर सिंह बराड़ की शिकायतों से इसका कोई संबंध नहीं था।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर क्यों लगाया जुर्माना?
अनुपालन हलफनामे और मामले की फाइल से न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता को तुच्छ अवमानना याचिकाएं दायर करने और अधिकारियों को नाम लेकर निशाना बनाने की आदत है, जो विधि का घोर दुरुपयोग है। ऐसी तुच्छ और परेशान करने वाली याचिकाएँ लंबित मामलों को बढ़ाती हैं और वास्तविक शिकायतों के लिए निर्धारित सीमित न्यायिक समय और संसाधनों की बर्बादी करती हैं। याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग बताया गया है। कड़ा संदेश देने और न्यायिक कार्यवाही की पवित्रता बनाए रखने के लिए, अदालत ने याचिकाकर्ता पर 3 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जो प्रत्येक प्रतिवादी को 1 लाख रुपये की समान किस्तों में देय होगा और चूक की स्थिति में लैंड रेवेन्यू के बकाया के रूप में वसूल किया जाएगा।
कोर्ट के अवमानना याचिका खारिज करने का कारण
सीडब्ल्यूपी-2066-2018 (दिनांक 30.07.2024 का आदेश) में डिवीजन बेंच द्वारा जारी निर्देशों का विधिवत पालन किया गया है जैसा कि अनुपालन हलफनामे और रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से स्पष्ट है। सीडब्ल्यूपी-2066-2018 का आदेश प्री-कॉन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स एक्ट, 1994 के कार्यान्वयन से संबंधित था और इसका वर्तमान अवमानना याचिका में लगाए गए आरोपों (स्कूल निधि का गबन, अभिलेखों की जालसाजी आदि) से कोई संबंध नहीं है। याचिकाकर्ता ने प्रतिवादियों द्वारा डिवीजन बेंच के निर्देशों की जानबूझकर या सोचे- समझे तरीके से की गयी अवज्ञा को साबित करने के लिए कोई सामग्री प्रस्तुत नहीं की है।
एफआईआर में, एसआईटी जांच की गई, गवाहों से पूछताछ की गई, एक आरोपी के खिलाफ चालान प्रस्तुत किया गया और आगे की जांच जारी है जो अवज्ञा के बजाय सक्रिय अनुपालन को दर्शाता है। याचिकाकर्ता एफआईआर में वास्तविक शिकायतकर्ता नहीं है और अवमानना को दबाव बनाने की रणनीति के रूप में इस्तेमाल करके जांच को अपने हिसाब से मोड़ने का प्रयास कर रहा है जो अवमानना के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
