लेफ्ट’ का आखिरी किला धवस्त : 50 साल में पहली बार एक भी राज्य में नहीं बची सरकार

by

नई दिल्ली :  भारतीय राजनीति के मानचित्र पर दशकों तक अपनी गहरी ‘लाल’ छाप छोड़ने वाला वामपंथ आज एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां उसके पैरों के नीचे से आखिरी जमीन भी खिसक चुकी है।

केरलम विधानसभा चुनावों के परिणामों ने न केवल वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) की हार सुनिश्चित कर दी, बल्कि पिछले पांच दशकों के उस गौरवशाली अध्याय पर भी विराम लगा दिया जिसमें कम्युनिस्टों के पास कम से कम एक राज्य की सत्ता सुरक्षित रहती थी।

कभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में एक शक्तिशाली ताकत रहने वाले वामदल अब 50 वर्षों से अधिक समय में पहली बार सभी राज्यों में सत्ता से बेदखल हो चुके हैं। दस साल बाद राज्य में कांग्रेस नीत यूडीएफ सरकार बनाएगी।

केरल में एलडीएफ की हार :  1977 के बाद यह पहला अवसर होगा जब देश के किसी भी राज्य में वामपंथियों की सरकार नहीं होगी। सत्ता का आखिरी गढ़ और ऐतिहासिक विरासत इस क्षण की गंभीरता को समझने के लिए अतीत पर एक नजर डालना जरूरी है।

केरलम सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि संसदीय साम्यवाद की वैश्विक प्रयोगशाला रहा है। 1957 में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में यहीं दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार बनी थी। 2011 में बंगाल के 34 वर्षों के शासन के अंत और 2018 में त्रिपुरा के पतन के बाद, केरलम ही वह आखिरी किला था जिसने वामपंथ को राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखा था।

लेफ्ट की किसी भी राज्य में सरकार नहीं ; 2021 में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर इतिहास रचने वाली एलडीएफ के लिए यह हार केवल सत्ता का जाना नहीं, बल्कि उस सांगठनिक ऊर्जा का अंत है जो सरकारी संरक्षण से फलती-फूलती थी। राष्ट्रीय राजनीति में सिकुड़ता प्रभाव एक समय था जब केंद्र की राजनीति वामदलों के इशारों पर घूमती थी। 2004 के दौर को याद करें, जब 61 लोकसभा सीटों के साथ वामपंथियों ने संप्रग सरकार की नीतियों की दिशा तय की थी। 1996 में तो ज्योति बसु, जो पहले ही दो दशकों तक बंगाल के मुख्यमंत्री रह चुके थे, संयुक्त मोर्चा गठबंधन के हिस्से के रूप में प्रधानमंत्री पद के करीब पहुंच गए थे।

बसु इस पद को स्वीकार करने के लिए तैयार थे, लेकिन उनकी पार्टी के पोलित ब्यूरो ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। पार्टी के भीतर ‘केरल लाबी’ के विरोध ने उसे ‘ऐतिहासिक भूल’ में बदल दिया। आज स्थिति यह है कि लोकसभा में इनकी संख्या इकाई के अंक तक सिमट गई है और बंगाल जैसे पुराने गढ़ों में एक-एक सीट के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

आर्थिक उदारीकरण, पहचान आधारित राजनीति का उदय और संगठनात्मक थकान ने उस कैडर आधारित ढांचे को झकझोर दिया है जो कभी इनकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था। केरलम का यह पतन भारतीय राजनीति में एक बड़े वैचारिक शून्य और वामपंथ के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्नचिह्न छोड़ गया है।

Share
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

You may also like

article-image
हिमाचल प्रदेश

चार जून को एक नहीं दो सरकारें बनेगी : जयराम ठाकुर

मुख्यमंत्री सुक्खू के कारण बनी ये परिस्थितियां, भाजपा को दोष देना बंद करें कांग्रेसी एएम नाथ। मंडी :  हिमाचल की जनता आने वाले चार जून को एक नहीं दो सरकारें चुनने जा रही है।...
article-image
हिमाचल प्रदेश

भटियात के खिलाड़ियों ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में मचाई धूम, कुलदीप पठानिया ने किया सम्मान

नवीश कुमार और अरफान को 51,000-51,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा खेलों के माध्यम से युवाओं में अनुशासन और फिटनेस बढ़ाने पर भी दिया जोर एएम नाथ। चुवाड़ी :  भटियात विधानसभा क्षेत्र...
article-image
दिल्ली , पंजाब , राष्ट्रीय , हरियाणा , हिमाचल प्रदेश

न तो मोदी और न ही अमित शाह बचा पाएंगे….कांग्रेस की सरकार में असम के CM जेल में होंग…. CM हिमंता बिस्वा सरमा ने राहुल गांधी को क्यों दिखाया ठेंगा

नई दिल्ली : कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी असम दौरे पर हैं। इस दौरान उन्होंने बुधवार को बीजेपी और आरएसएस पर जमकर निशाना साधा. साथ ही। कांग्रेस नेता गांधी...
article-image
हिमाचल प्रदेश

पनयाली की महिलाओं को मशरूम की खेती सिखाएगा आरसेटी

रोहित भदसाली। हमीरपुर 21 अक्तूबर। पंजाब नेशनल बैंक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरसेटी) हमीरपुर के सौजन्य से सोमवार को नादौन उपमंडल के गांव पनयाली में दस दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आरंभ हुआ। इस शिविर...
Translate »
error: Content is protected !!