चंडीगढ़ । शिरोमणि अकाली दल की सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की हत्या के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग की है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पंजाब में कथित राजनेता-पुलिस-ड्रग माफिया गठजोड़ की व्यापक जांच कराने की भी अपील की है। गृह मंत्री अमित शाह के 20 अक्टूबर को प्रस्तावित पंजाब दौरे से एक दिन पहले लिखे गए इस पत्र में उन्होंने नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया।
हरसिमरत कौर बादल ने पत्र में आरोप लगाया कि परविंदर सिंह झोटा मानसा क्षेत्र में मेडिकल स्टोरों से कथित तौर पर प्रतिबंधित दवाओं और सिंथेटिक नशों की बिक्री के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उन्होंने दावा किया कि झोटा ने घर से निकलने से पहले मानसा के डीएसपी को सूचना देकर संबंधित मेडिकल स्टोर पर पहुंचने के लिए कहा था, लेकिन पुलिस मौके पर नहीं पहुंची।
पत्र के अनुसार, झोटा ने इसके बाद मेडिकल स्टोर संचालक अश्विनी कुमार द्वारा कथित तौर पर नशीली दवाएं बेचने का मामला लाइव स्ट्रीम करना शुरू किया। आरोप है कि इसके कुछ ही देर बाद उन्हें गोली मार दी गई, जबकि दो अन्य लोग भी घायल हुए।
पिता के आरोपों के आधार पर जांच की मांग
अकाली दल सांसद ने कहा कि झोटा के पिता भीम सिंह ने पुलिस को दिए बयान में आरोप लगाया था कि उनका बेटा पंजाब में सक्रिय कथित राजनेता-पुलिस-ड्रग माफिया गठजोड़ का शिकार हुआ। पिता के मुताबिक, झोटा को नशे के कारोबार का पर्दाफाश करने के कारण झूठे मामलों में फंसाया गया और जेल भेजा गया था। उन्होंने तत्कालीन पुलिस अधिकारियों पर भी गंभीर आरोप लगाए।
हरसिमरत कौर बादल के पत्र में मानसा के तत्कालीन डीएसपी संजीव गोयल, तत्कालीन एसएसपी नानक सिंह, मौजूदा सब-डिवीजन डीएसपी हरजिंदर सिंह गिल और एसएचओ बेअंत कौर सहित कुछ अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग की गई है। उन्होंने ड्रग इंस्पेक्टर शीशम मित्तल पर भी कथित तौर पर नशे के कारोबार से जुड़े लोगों के साथ मिलीभगत का आरोप होने का उल्लेख किया। ये आरोप पत्र और झोटा के पिता के बयान के हवाले से लगाए गए हैं; इनकी स्वतंत्र पुष्टि जांच के जरिए होनी बाकी है।
मेडिकल स्टोर संचालक को हथियार लाइसेंस मिलने पर सवाल
हरसिमरत कौर बादल ने मेडिकल स्टोर संचालक अश्विनी कुमार को हथियार का लाइसेंस जारी किए जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि अश्विनी पर पहले भी प्रतिबंधित साइकोट्रोपिक दवाओं की बिक्री के आरोप लगे थे और वह कुछ समय जेल में भी रहा था। इसके बावजूद, उनके अनुसार, जेल से रिहाई के कुछ महीने बाद वर्ष 2024 में तत्कालीन मानसा एसएसपी ने उसके हथियार लाइसेंस को मंजूरी दी थी।
उन्होंने कहा कि मामले में कथित प्रभावशाली लोगों की भूमिका सामने लाने के लिए उच्चस्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। उनकी मांग है कि जांच केवल झोटा की हत्या तक सीमित न रहे, बल्कि नशा तस्करी में कथित तौर पर शामिल लोगों, संबंधित अधिकारियों और नशे के खिलाफ आवाज उठाने वालों को दबाने के लिए पुलिस के इस्तेमाल से जुड़े मामलों की भी पड़ताल की जाए।
नशा विरोधी आवाजों को दबाने का भी उठाया मुद्दा
अकाली दल सांसद ने सुनाम के मोहनजीत सिंह का मामला भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान के एक कार्यक्रम में चिट्टे की बिक्री के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से विरोध जताने के कारण उन्हें प्रताड़ित किया गया। उन्होंने गुलजार सिंह की आत्महत्या का भी उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा से चिट्टे की खुलेआम बिक्री को लेकर सवाल पूछने के बाद उन्हें पुलिस की प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।
हरसिमरत कौर बादल ने कहा कि पंजाब में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को कथित तौर पर चुप कराने और नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने गृह मंत्री से आग्रह किया कि परविंदर सिंह झोटा की हत्या के सभी पहलुओं और कथित व्यापक ड्रग नेटवर्क की जांच सीबीआई को सौंपी जाए, ताकि दोषियों और उन्हें संरक्षण देने वाले लोगों की पहचान हो सके।
