हिमाचल प्रदेश का कर्ज प्रबंधन रोडमैप : 2029-30 तक ऋण-GSDP अनुपात 40.64% करने का लक्ष्य

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एएम नाथ। शिमला : हिमाचल प्रदेश सरकार ने बढ़ते कर्ज के दबाव के बीच नई उधारी पर निर्भरता घटाने और मौजूदा ऋण के बेहतर प्रबंधन के लिए मध्यम अवधि की रणनीति तैयार की है। सरकार का लक्ष्य लंबी अवधि के ऋण, कम ब्याज लागत और केंद्र सरकार की वित्तीय योजनाओं के बेहतर उपयोग के जरिए 2029-30 तक ऋण-GSDP अनुपात घटाकर 40.64 प्रतिशत करना है।

कर्ज प्रबंधन की नई रणनीति

राज्य सरकार ने वर्ष 2026-27 से 2029-30 तक के लिए मध्यम अवधि की ऋण प्रबंधन रणनीति तैयार की है। इसके तहत अगले चार वर्षों में ऋण-GSDP अनुपात कम करने, महंगे ऋणों पर निर्भरता घटाने और पुनर्भुगतान का दबाव नियंत्रित करने पर जोर दिया गया है।

ऋण-GSDP अनुपात का अर्थ

ऋण-GSDP अनुपात राज्य की अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में उसके कुल कर्ज को दर्शाता है। अनुपात कम होने का अर्थ है कि राज्य की आय और आर्थिक क्षमता के मुकाबले कर्ज का बोझ घट रहा है। इससे भविष्य में उधारी की क्षमता और वित्तीय विश्वसनीयता बेहतर हो सकती है।

राज्य पर करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। नई रणनीति में महंगे और कम अवधि वाले ऋणों पर निर्भरता घटाने की योजना है। सरकार ब्याज भुगतान का बोझ कम करने और लंबी अवधि के वित्तीय संसाधन जुटाने पर भी ध्यान देगी।

लंबी अवधि के ऋण को प्राथमिकता

सरकार पांच वर्ष तक की अवधि वाले नए बाजार ऋण से यथासंभव दूरी बनाएगी। इसके बजाय 15 से 20 वर्ष या उससे अधिक अवधि वाले बॉन्ड के जरिए वित्तीय जरूरतें पूरी करने की योजना है। इसका उद्देश्य निकट अवधि में पुनर्भुगतान का दबाव कम करना और नकदी प्रवाह को बेहतर ढंग से प्रबंधित करना है।

लंबी अवधि के ऋण से मूलधन चुकाने के लिए अधिक समय मिलता है और हर वर्ष बड़ी रकम जुटाने की आवश्यकता कम हो सकती है। हालांकि, ब्याज दर अधिक रहने या ऋण लंबे समय तक जारी रहने पर कुल ब्याज भुगतान बढ़ सकता है। इसलिए लंबी अवधि के साथ कम ब्याज दर हासिल करना भी जरूरी होगा।

ब्याज लागत घटाने की योजना

राज्य सरकार के सामने कर्ज की राशि के साथ उस पर चुकाया जाने वाला ब्याज भी बड़ी चुनौती है। नई रणनीति में औसत ब्याज लागत को मौजूदा करीब 6.77 प्रतिशत से नीचे लाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार कम ब्याज दर वाले विकल्पों को प्राथमिकता देकर ब्याज भुगतान का दबाव घटाना चाहती है।

ब्याज लागत कम होने से बजट पर सीधा असर पड़ेगा। ब्याज भुगतान में बचने वाली राशि शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और अन्य विकास कार्यों पर खर्च की जा सकती है। इसके विपरीत, ब्याज दर बढ़ने पर नियमित खर्च और विकास योजनाओं के लिए उपलब्ध धन कम हो सकता है।

कर्ज की औसत अवधि 11 वर्ष तक बढ़ाने की तैयारी

ऋण प्रबंधन रणनीति में कर्ज की औसत परिपक्वता अवधि बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। इसे करीब 11 वर्ष तक ले जाने की तैयारी है। इससे पुराने ऋणों के भुगतान का दबाव एक साथ आने के बजाय लंबी अवधि में फैल सकेगा।

रणनीति में केंद्र से मिलने वाले 50 वर्ष की अवधि वाले ब्याजमुक्त ऋण का अधिकतम उपयोग भी शामिल है। इससे राज्य को कम वित्तीय बोझ के साथ बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। ऐसे ऋणों का बेहतर उपयोग बाजार से महंगा कर्ज लेने की जरूरत भी घटा सकता है।

कर्ज की लागत और पुनर्भुगतान पर फोकस

सरकार का यह रोडमैप ऐसे समय में आया है जब हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति में कर्ज प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। नई रणनीति का उद्देश्य केवल कर्ज की राशि को नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि कर्ज की लागत, अवधि और पुनर्भुगतान की समय-सारणी को बेहतर ढंग से प्रबंधित करना भी है।

वर्ष 2029-30 तक ऋण-GSDP अनुपात को 40.64 प्रतिशत तक लाने के लिए बाजार से लिए जाने वाले ऋण की अवधि और ब्याज दर पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। उपलब्ध केंद्रीय वित्तीय विकल्पों को भी रणनीति में शामिल किया जाएगा। इन आधारों पर राज्य के ऋण पोर्टफोलियो को व्यवस्थित किया जाएगा।

संभावित असर और चुनौतियां

सरकार की प्रस्तावित रणनीति का असर तीन प्रमुख क्षेत्रों में दिख सकता है—महंगे कर्ज पर निर्भरता कम करना, लंबी अवधि के ऋण को प्राथमिकता देना और ब्याज भुगतान के दबाव को नियंत्रित करना। यदि तय रोडमैप के अनुसार ऋण-GSDP अनुपात घटता है, तो राज्य के वित्तीय प्रबंधन पर दबाव कम हो सकता है।

इसका अर्थ होगा कि राज्य की आय का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा कर्ज और ब्याज चुकाने में खर्च होगा। इससे विकास कार्यों के लिए अधिक धन उपलब्ध हो सकता है। हालांकि, लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल लंबी अवधि का कर्ज लेना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को राजस्व बढ़ाने, अनावश्यक खर्च नियंत्रित करने, कम ब्याज वाले ऋण चुनने और समय पर पुनर्भुगतान की योजना बनाने पर भी लगातार ध्यान देना होगा।

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