18 महीने में ₹19000 करोड़ कर्ज : 2030-31 तक उसका पेंशन पर होने वाला खर्च ₹19,728 करोड़ हो जाएगा

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शिमला : हिमाचल प्रदेश सरकार प्रदेश की विकास की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह से केंद्र सरकार पर निर्भर है। कर्ज के बोझ तले दबे हिमाचल प्रदेश में आने वाला वक्त में वित्तीय संकट बढ़ सकता है। जिसके चलते हिमाचल प्रदेश की परेशानी बढ़ती हुई नजर आ रही है।
राज्य सरकार ने CAG को बताया है कि वर्ष 2030-31 तक उसका पेंशन पर होने वाला खर्च ₹19,728 करोड़ हो जाएगा। यह वर्तमान में लगभग ₹10,000 करोड़ से भी कम है। वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 के बीच कुल ₹90,000 करोड़ का खर्चा हिमाचल प्रदेश को पेंशन पर ही करना पड़ेगा। हिमाचल प्रदेश सरकार पर मौजूदा वक्त में 85 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज हो चुका है। हालत यह है कि कर्ज चुकाने के लिए भी राज्य सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा है। अगले वित्तीय वर्ष से पहले ही कर्ज का आंकड़ा 1 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा। उम्मीद जताई जा रही है कि अगर हिमाचल प्रदेश सरकार को 16वें वित्त आयोग से रिवेन्यू डिफिसिट ग्रांट मिला, तो इससे प्रदेश को राहत जरूर मिल सकती है।
पेंशन का खर्च होगा दोगुना : – राज्य सरकार ने CAG को बताया है कि वर्ष 2030-31 तक उसका पेंशन पर होने वाला खर्च ₹19,728 करोड़ हो जाएगा। यह वर्तमान में लगभग ₹10,000 करोड़ से भी कम है। वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 के बीच कुल ₹90,000 करोड़ का खर्चा हिमाचल प्रदेश को पेंशन पर ही करना पड़ेगा।
कॉन्ग्रेस के OPS के वादे से राज्य के अन्य विकास कार्यों के बजट में कटौती होने की आशंका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि राज्य के बजट में पहले पेंशन का हिस्सा मात्र 13% था जो कि OPS के बाद बढ़कर 17% हो जाएगा। पुरानी पेंशन के कारण होने वाला यह खर्च राज्य सरकार के कर्मचारियों को दी जाने वाली तनख्वाह पर खर्च के लगभग बराबर होगा।

वेतन पर 20 हजार 639 करोड़ रुपये होंगे खर्च : – हिमाचल प्रदेश पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जा रहा है। इसका इशारा एक दशक से भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) लंबे वक्त से कर रहा है। CAG ने डेब्ट ट्रैप की तरफ इशारा किया था। वर्ष 2026-27 में हिमाचल प्रदेश में सरकार को कर्मचारियों का वेतन देने के लिए ही 20 हजार 639 करोड़ रुपये खर्च करने हैं। चिंता की बात यह है कि वेतन आयोग के सिफारिश के बाद राज्य सरकार के सिर पर आए एरियर की लॉयबिलिटी आउट ऑफ कंट्रोल होती चली जाएगी।
हालांकि बीते कुछ वक्त में सरकारी नौकरी में कर्मचारियों की संख्या घटी है, लेकिन बावजूद इसके अनुबंध अवधि को पेंशन के लिए दिए जाने वाले बकाया एरियर पर राज्य सरकार को ज्यादा धन खर्चना होगा। हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में वित्त आयोग के प्रतिनिधिमंडल के सामने भी यह तथ्य रखे हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य में सबसे ज्यादा है खर्च : हिमाचल प्रदेश सरकार ने 16वें वित्त आयोग के सामने रिपोर्ट पेश की है। वित्तीय मेमोरेंडम में हिमाचल सरकार ने कहा है कि नए वेतन आयोग के बाद से सरकारी कर्मचारियों के वेतन का खर्च 59 फीसदी तक बढ़ गया है। राज्य सरकार में शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों की संख्या सबसे ज्यादा है। इन्हीं दो विभागों में कर्मचारियों को सबसे ज्यादा वेतन देने पर राज्य सरकार को खर्च करना पड़ रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारियों पर साल 2017-18 में 5 हजार 615 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
हिमाचल सरकार को 16वें वित्त आयोग से उम्मीदें : वर्ष 2018-19 में यह बढ़कर 5 हजार 903 करोड़ रुपये हो गया। साल 2019-20 में 6 हजार 299 करोड़ और साल 2020-21 में 6 हजार 476 करोड़ रुपये का खर्च हुआ। वर्ष 2025-26 में इस वेतन पर 9 हजार 361 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।

वित्त वर्ष 2027-28 में ये खर्च 22 हजार 502 करोड़ सालाना, फिर वर्ष 2028-29 में 24 हजार 145 करोड़, वर्ष 2029-30 में 26 हजार 261 करोड़ रुपए हो जाएगा। वर्ष 2030-31 में सरकारी कर्मियों के वेतन का खर्च सालाना 28 हजार 354 करोड़ रुपए हो जाएगा।

कॉन्ग्रेस सरकार ने लिया ₹19,000 करोड़ कर्ज : OPS के कारण हिमाचल प्रदेश पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ के बीच राज्य के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्कू ने 16वें वित्त आयोग से मदद की मांग भी कर दी है। उन्होंने कहा है कि राज्य को विकास के लिए विशेष आर्थिक मदद दी जाए। इन सबके बीच कॉन्ग्रेस सरकार का धुआंधार तरीके से कर्ज लेने का मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है। हिमाचल प्रदेश पर वर्तमान में ₹88,000 करोड़ से भी अधिक का कर्ज है। कॉन्ग्रेस सरकार बीते डेढ़ वर्ष में ही लगभग ₹19,000 करोड़ का कर्ज राज्य पर चढ़ा दिया है।
राज्य के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने खुद माना है कि उनके राज्य को कर्ज चुकाने के लिए ही नया कर्ज लेना पड़ रहा है। राज्य का कर्ज उसकी GDP का 40% से अधिक हो चुका है। उसका राजकोषीय घाटा भी GDP के 5% के ऊपर है। जबकि नियमों के मुताबिक़, किसी भी राज्य का कर्ज GDP का 20% जबकि राजकोषीय घाटा 3% से अधिक नहीं होना चाहिए।
ऐसे में हिमाचल प्रदेश सरकार के लिए आने वाला वक्त परेशानियों से भरा रहने वाला है. सरकार को 16वें वित्त आयोग से मिलने वाले रिवेन्यू डिफिसिट ग्रांट में राहत की उम्मीद है।

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