चंडीगढ़ : पिछले साल एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। इमसें एक 88 वर्षीय बुजुर्ग चंडीगढ़ की सड़क पर कचरा बीनते दिखे। वे इस उम्र में हर रोज सड़क से कचरा उठाकर चंड़ीगढ़ को साफ-स्वच्छ बनाने की पहल पिछले 3-4 साल से चला रहे हैं।
वीडियो वायरल होने पर बुजुर्ग के इस कदम की चारों तरफ तारीफ हुई। जब मीडिया और प्रशासन बुजुर्ग तक पहुंचा तो खुलासा सुनकर सब दंग रह गए। ये बुजुर्ग पूर्व आईपीएस अधिकारी था। डीआईजी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।
चंडीगढ़ के सेक्टर-49 स्थित आईएएस/आईपीएस सोसाइटी में रहते हैं। अब केंद्र सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार देने का ऐलान किया है। पूर्व आईपीएस अधिकारी का नाम इंदरजीत सिंह सिद्धू है। उन्होंने अपनी उम्र और हैसियत के इतर चंडीगढ़ को साफ स्वच्छ शहर बनाने का बीड़ा उठाया। गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले जब पद्म श्री पुरस्कारों की सूची में उनका नाम दिखा तो इंदरजीत सिंह सिद्धू की चर्चा दोबारा शुरू हुई।
‘लोग पागल समझते, मजाक उड़ाते’
इंदरजीत सिंह सिद्धू 1964 बैच के पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। करीब 30 साल पहले डीआईजी के पद से रिटायर्ड हुए। सुबह पांच बजे उठकर वह सेक्टर-49 और आसपास सड़क और पार्कों में कूड़ा बीनते हैं। इंदरजीत सिंह कहना है कि कुछ लोग पागल समझते हैं। मेरा मजाक उड़ाते हैं, लेकिन सफाई करने में मुझे कोई शर्म नहीं है। उनकी पहल का नतीजा यह हुआ कि अब मोहल्ले के अन्य लोग भी इस मुहिम का हिस्सा बन चुके हैं। उनका लक्ष्य चंडीगढ़ को देश में सबसे स्वच्छ शहर बनाना है। उनका कहना है कि जब तक शरीर साथ देगा तब तक सफाई अभियान चलाता रहूंगा।
संगरूर में जन्म, अमृतसर में तैनाती और चंडीगढ़ को स्वच्छ बनाने की ख्वाहिश
इंदरजीत सिंह सिद्धू का कहना है कि हर जगह सफाई होने से अच्छा लगता है। मुझे भी साफ-सफाई पसंद है। मगर चंडीगढ़ में पढ़े-लिखे लोगों को सड़क पर कूड़ा फेंकते देखने पर दुख होता है। लोग वीडियो बनाते हैं और पागल समझते हैं। उनका कहना है कि चंडीगढ़ को सिटी ब्यूटीफुल कहा जाता है, लेकिन स्वच्छता रैंकिंग में शहर पिछड़ गया। यह उन्हें अच्छा नहीं लगा। इसके बाद ही उन्होंने खुद ही सफाई का बीड़ा उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि मैं किसी को शिक्षा नहीं दे रहा हूं। बस खुद ही लोगों का कूड़ा उठा रहा हूं।
मूलरूप से पंजाब के संगरूर जिले के रहने वाले इंदरजीत सिंह आतंकवाद के दौर में अमृतसर सिटी एसपी रहे हैं। साल 1986 में वह चंडीगढ़ आ गए। करीब आठ साल बाद 1996 में डीआईजी के पद से सेवानिवृत्ति ली। उनका एक बेटा विदेश में रहता है। पत्नी का पहले ही निधन हो चुका है।
