UPSC टॉपर कैसे पहुंचा सलाखों के पीछे? अपनी खास कार्यशैली के लिए मशहूर प्रदीप शुक्ला कौन? क्यों हुई गिरफ्तारी

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UPSC में टॉप करना किसी सपने के सच होने जैसा माना जाता है- लेकिन जब यही सपना समय के साथ सवालों के घेरे में आ जाए, तो कहानी और भी गंभीर हो जाती है। साल 1981 बैच की सिविल सेवा परीक्षा में टॉप करने वाले आईएएस अधिकारी प्रदीप शुक्ला, जो कभी प्रशासनिक प्रतिभा की मिसाल थे, आज भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं।

फिजिक्स में टॉप रैंक के साथ पोस्ट-ग्रेजुएट रहे शुक्ला एक साधारण परिवार से निकले थे, और उनकी शानदार शैक्षणिक शुरुआत ने उन्हें उत्तर प्रदेश कैडर के सबसे होनहार अधिकारियों में शुमार करा दिया था।

हालांकि, किसी ने नहीं सोचा था कि तीन दशक बाद, वही प्रदीप शुक्ला एक बड़े घोटाले के आरोप में जेल जाएंगे। आईएएस प्रदीप शुक्ला की कहानी एक चेतावनी की तरह है कि कैसे करियर की शानदार शुरुआत के बावजूद, कुछ गलत फैसलों और एक असामान्य कार्यशैली ने उनके पूरे पेशेवर जीवन को दागदार बना दिया।

अपनी खास कार्यशैली के लिए मशहूर रहे प्रदीप शुक्ला

शुरुआती पोस्टिंग में उनके सहकर्मी उन्हें एक तेजतर्रार लेकिन कुछ हद तक गैर-पारंपरिक अधिकारी के रूप में याद करते हैं। उनकी एक अनोखी आदत थी: वह अक्सर रात 8 बजे या उसके बाद दफ्तर आते थे और पूरी रात काम करते थे, जिससे उनके सहयोगियों को समन्वय स्थापित करने में कठिनाई होती थी। शुरुआती दौर में उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा था।

और फिर शुरू होता है विवादों का दौर: NRHM घोटाला
शुक्ला के करियर का सबसे विवादास्पद दौर 2009 से 2011 के बीच आया, जब वह उत्तर प्रदेश में परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के मिशन निदेशक के रूप में कार्यरत थे। इसी अवधि के दौरान, एनआरएचएम के कार्यान्वयन में व्यापक अनियमितताएं (Irregularities) सामने आईं, जो एक हजारों करोड़ रुपये के महाघोटाले में बदल गईं।

Who is IAS Pradeep Shukla? कौन हैं IAS प्रदीप शुक्ला?
प्रदीप शुक्ला का एजुकेशनल रिकॉर्ड शानदार रहा है। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से फिजिक्स में फर्स्ट रेंक के साथ मास्टर्स की डिग्री हासिल की। 1981 में उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा में टॉप रैंक हासिल की और उत्तर प्रदेश (UP) कैडर को चुना।

मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में फाइनल रिजल्ट के बाद वह बैच में दूसरे स्थान पर रहे थे। 1983 में उनकी पहली पोस्टिंग उप-मंडल प्रशासनिक स्तर पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप में हुई थी।

फिर सलाखों के पीछे क्यों पहुंचे?
2009 से 2011 के बीच, एनआरएचएम में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं (गड़बड़ी) सामने आईं। इस दौरान, प्रदीप शुक्ला परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव और एनआरएचएम के मिशन निदेशक थे। आरोप है कि उनके कार्यकाल में बिना टेंडर के ठेके दिए गए, नियमों की पूरी तरह अनदेखी की गई और व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई।

शुक्ला पर एनआरएचएम के कार्यान्वयन संबंधी निर्णय लेने, कार्यकारी समिति के अध्यक्ष के रूप में उन फैसलों को लागू करने और कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति के प्रमुख के रूप में उनकी निगरानी करने की ज़िम्मेदारी थी।

अप्रैल 2011 में शुक्ला को पद से हटा दिया गया

एनआरएचएम योजना में गड़बड़ी तब सामने आईं जब एक के बाद एक दो मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की हत्या कर दी गई। इसके बाद राज्य सरकार ने मामले का संज्ञान लिया और जांच शुरू हुई। अप्रैल 2011 में शुक्ला को उनके पद से हटा दिया गया और बाद में उन्हें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया।

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