अधिवक्ता मुकेश शर्मा ने जोगिंद्रा बैंक सोलन मामला सीबीआई व ईडी को सौंपने हेतु राष्ट्रपति से की अपील

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एएम नाथ। नई दिल्ली/शिमला : अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने माननीय राष्ट्रपति महोदय से जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, सोलन (हिमाचल प्रदेश) में कथित रूप से हुए अरबों रुपये के वित्तीय घोटालों, गबन, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, खातों में हेराफेरी और रिकॉर्ड में कूटरचना से जुड़े मामलों को लेकर प्रत्यक्ष संवैधानिक हस्तक्षेप की अपील की है।                  अधिवक्ता शर्मा ने मांग की है कि पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सी बी आई) तथा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को सौंपी जाए, क्योंकि उनके अनुसार अब तक सभी वैधानिक, नियामक और प्रशासनिक संस्थाएं प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रही हैं।

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ तथा हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय, शिमला के अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने दिनांक 05 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली को भेजे गए अपने विस्तृत अभ्यावेदन में कहा है कि मुख्य सतर्कता विभाग (सीवीडी), नाबार्ड मुंबई, नाबार्ड मुख्यालय, नाबार्ड क्षेत्रीय कार्यालय शिमला, भारतीय रिज़र्व बैंक (आर बी आई) का सी एम एस पोर्टल, प्रवर्तन निदेशालय (ई डी), सी पी ग्राम पोर्टल, रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसायटीज (आर सी एस) हिमाचल प्रदेश, मुख्यमंत्री कार्यालय हिमाचल प्रदेश तथा उपायुक्त शिमला सहित सभी सक्षम प्राधिकरणों को बार-बार शिकायतें देने के बावजूद कोई स्वतंत्र या समयबद्ध जांच नहीं कराई गई।
अभ्यावेदन के अनुसार, अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच दायर की गई शिकायतें केवल आरोपात्मक नहीं थीं, बल्कि उनके साथ ऑडिट रिपोर्ट, निरीक्षण टिप्पणियाँ, आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज़, बैंक रिकॉर्ड और आधिकारिक पत्राचार संलग्न थे, जिनमें एनपीए छुपाने, संदिग्ध प्रोविज़निंग, फर्जी ऋण, खातों में हेराफेरी, पद के दुरुपयोग और सार्वजनिक धन के कथित गबन के संकेत दर्शाए गए हैं। इसके बावजूद, अधिकांश शिकायतों को “प्रशासनिक प्रकृति” का बताकर बंद या अग्रेषित कर दिया गया।
अधिवक्ता शर्मा ने नाबार्ड शिकायतें 43 करोड़ के घोटाले संबंधी, बोर्ड भंग हेतु, भ्रष्टाचार एवं ऑडिट उल्लंघन का उल्लेख किया, जिन्हें नाबार्ड ने “प्रशासकीय प्रकृति” या “दोहराव” बताकर बिना फॉरेंसिक जांच के बंद कर दिया गया। आरबीआई सीएमएस शिकायतें को भी समान औपचारिक कारणों से निपटाया गया या लंबित रखा गया। नाबार्ड ने अपने पत्रों आदि में शिकायतें रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसायटीज़ को अग्रसारित कर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया
अधिवक्ता शर्मा की प्रतिनिधि-याचिका में वर्ष 2008 से अब तक जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक, सोलन में तैनात रहे जिन प्रबंध निदेशकों (एम डी) की भूमिका पर प्रश्न उठाए गए हैं, उनमें संजीव कुमार, के.सी. चमन, एल.के. शर्मा, रखिल कहलोन, पंकज ललित, यशपाल शर्मा, डी.आर. शर्मा, कैप्टन आर.एस. राठौर, एस.डी. नेगी, मनोज चौहान, एल.आर. वर्मा, ताशी सांडुप, नरेंद्र कुमार, पंकज सूद तथा पद्मा छोडोन के नाम शामिल बताए गए हैं। इसी प्रकार, वर्ष 2005 से अब तक के चेयरमैन एवं बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (बी ओ डी) के रूप में लज्जा किशोर शर्मा, मोहन मेहता, विजय ठाकुर, योगेश कुमार, मुकेश शर्मा सहित उस अवधि के समस्त बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का उल्लेख किया गया है।
याचिका में बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों राम पाल (एजीएम), कुलदीप सिंह (एजीएम), हरीश शर्मा (एजीएम), गुरमीत सिंह (वरिष्ठ प्रबंधक) व कलेक्टर–रिकवरी तथा शाखा प्रबंधकों दीपक सूद, उमराज ठाकुर और जगदीप शर्मा की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं और आरोप लगाया गया है कि इन अधिकारियों की संलिप्तता के बावजूद संस्थागत स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
अभ्यावेदन के अनुसार, राम पाल (एजीएम) के विरुद्ध एफ आई आर संख्या 45/2019, भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 409, 467 और 468 के तहत, पुलिस थाना दाड़लाघाट, जिला सोलन (हिमाचल प्रदेश) में दर्ज है, जिसकी वर्तमान स्थिति रिकॉर्ड के अनुसार यह बताई गई है कि आरोपी जमानत पर है। इसके अतिरिक्त, राम पाल के विरुद्ध ही एफ आई आर संख्या 29/2023 दिनांक 26.04.2023, धारा 420, 120-बी, 467, 471, 415 और 34 आई पी सी के तहत, पुलिस थाना दाड़लाघाट, जिला सोलन में दर्ज है, जो लंबित बताई गई है। वहीं कुलदीप सिंह (एजीएम) एवं अन्य के विरुद्ध एफ आई आर संख्या 00003/2025, राज्य सतर्कता विभाग, सोलन द्वारा दर्ज की गई है, जिसकी वर्तमान स्थिति जांच प्रचलित बताई गई है।
अधिवक्ता शर्मा ने यह भी आरोप लगाया है कि इन एफ आई आर के बावजूद संबंधित अधिकारियों को वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ए सी आर) में क्लीन-चिट, प्रोबेशन की पुष्टि और पदोन्नतियाँ मिलती रहीं, जिस पर आर सी एस, नाबार्ड और आर बी आई द्वारा कोई प्रभावी आपत्ति दर्ज नहीं की गई। उनका कहना है कि शिकायतों को बार-बार उन्हीं प्राधिकरणों या बैंक प्रबंधन को भेजा गया, जिनकी भूमिका स्वयं संदेह के घेरे में है।
याचिका में स्थानीय प्रशासन, जिसमें पुलिस और सिविल प्रशासन शामिल हैं, पर यह आरोप भी लगाया गया है कि आरोपित अधिकारियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई और कई मामलों में उन्हें संरक्षण मिला। अभ्यावेदन में यह भी कहा गया है कि कुछ आरोपित अधिकारियों के वर्तमान सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार से कथित राजनीतिक संबंध बताए जाते हैं, जिसके चलते जांच की गति और निष्पक्षता प्रभावित होने का दावा किया गया है, जिसे रिकॉर्ड-आधारित आशंकाओं के रूप में दर्ज किया गया है।
अधिवक्ता शर्मा ने अपने अभ्यावेदन में बाघाट अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक, सोलन की वर्तमान स्थिति का भी उल्लेख किया है, जहां जमाकर्ताओं को निकासी में कठिनाइयों और नियामकीय पाबंदियों का सामना करने के दावे सामने आए हैं। इसके साथ ही कांगड़ा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक से जुड़े मामलों का संदर्भ देते हुए कहा गया है कि वहां उजागर हुए प्रकरण भी सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में निगरानी और नियामकीय तंत्र की व्यापक विफलताओं की ओर संकेत करते हैं।
अधिवक्ता मुकेश शर्मा ने माननीय राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वे संवैधानिक संरक्षक के रूप में हस्तक्षेप करते हुए जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, सोलन के पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, व्यापक और समयबद्ध जांच सी बी आई से कराएं तथा ई डी को धनशोधन निवारण अधिनियम (पी एम एल ए) के तहत सार्वजनिक धन के संभावित दुरुपयोग और धन के प्रवाह की जांच सौंपें, ताकि जवाबदेही तय हो सके और सार्वजनिक हित की रक्षा हो। यदि अब भी स्वतंत्र केंद्रीय जांच नहीं हुई, तो यह नियामक एवं प्रशासनिक तंत्र की गंभीर विफलता मानी जाएगी और इससे सार्वजनिक धन, जमाकर्ताओं के हित तथा सहकारी बैंकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।

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