आप से भाजपा में गए 7 सांसद राष्ट्रपति से मिलेंगे : पंजाब सरकार पर ‘राजनीतिक दबाव’ का आरोप

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नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए सात राज्यसभा सांसद अब अपने अगले कदम के साथ राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा उठाने जा रहे हैं।

ये सभी सांसद 5 मई को सुबह 10:40 बजे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करेंगे। इस बैठक में वे पंजाब सरकार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएंगे। उनका आरोप है कि राज्य सरकार उनके खिलाफ राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रही है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब हाल ही में हुए दलबदल ने पंजाब और राष्ट्रीय राजनीति दोनों में हलचल बढ़ा दी है।

दलबदल से बदला समीकरण, कौन-कौन शामिल

अप्रैल 2026 के आखिर में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिला, जब AAP के सात राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हो गए। इनमें राघव चड्ढा, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, अशोक कुमार मित्तल, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजेंद्र गुप्ता शामिल हैं। ये सांसद राज्यसभा में पार्टी की दो-तिहाई से ज्यादा ताकत रखते थे। इसी आधार पर उन्होंने दलबदल विरोधी कानून के तहत खुद को अयोग्यता से बचाते हुए बीजेपी में विलय का रास्ता अपनाया। राज्यसभा के सभापति ने भी इस विलय को मंजूरी दे दी है।

एंटी-डिफेक्शन कानून बना ढाल, लेकिन विवाद जारी

इस पूरे मामले का केंद्र दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 4 है। इसके तहत, अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई या उससे अधिक सदस्य किसी अन्य पार्टी में शामिल होते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से सुरक्षा मिल जाती है। हालांकि, इस प्रावधान को लेकर पहले भी बहस होती रही है। आलोचकों का कहना है कि यह नियम बड़े पैमाने पर दलबदल को आसान बनाता है और मतदाताओं की जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। AAP ने भी इस विलय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जिसमें दस्तावेजों की सत्यता और प्रक्रिया के पालन को लेकर आपत्ति जताई गई है।

अब आमने-सामने दोनों पक्ष, राष्ट्रपति से अलग-अलग मुलाकात

दिलचस्प बात यह है कि जहां ये सात सांसद राष्ट्रपति से अपनी शिकायत रखने जा रहे हैं, वहीं उसी दिन पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी राष्ट्रपति से मिलने वाले हैं। सीएम मान की ओर से उम्मीद जताई जा रही है कि वे इन सांसदों को वापस बुलाने और पूरे विलय की वैधता पर सवाल उठाएंगे। इससे यह साफ है कि मामला अब सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक स्तर तक पहुंच चुका है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ राष्ट्रपति के सामने अपनी बात रखेंगे, जिससे यह टकराव और तेज हो सकता है।

आम नागरिक के लिए क्या मायने

यह घटनाक्रम सिर्फ नेताओं के बीच की खींचतान नहीं है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था, दलबदल कानून और राजनीतिक जवाबदेही जैसे बड़े सवालों को सामने लाता है। जब बड़े पैमाने पर सांसद पार्टी बदलते हैं, तो इसका असर नीति-निर्माण और जनता के भरोसे दोनों पर पड़ता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस विवाद का समाधान किस दिशा में जाता है और इसका राजनीतिक संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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