एजीएम हरिश शर्मा को बचाने के लिए प्रबंध निदेशक पंकज सूद ने ताक पर रहे नियम : मुकेश शर्मा

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जोगिंद्रा बैंक ने चुकाया RBI का ₹3.50 लाख दंड, गैर कानूनी तरीके से ‘प्रावधान’ बनाने का आरोप

एएम नाथ। शिमला : मुकेश कुमार शर्मा अधिवक्ता पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट चंडीगढ़ ने अपनी शिकायत में जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, सोलन के प्रबंधन, बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, चेयरमैन तथा निगरानी/नियामक संस्थाओं की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अधिवक्ता शर्मा ने आरोप लगाया है कि कि RBI द्वारा लगाए गए मौद्रिक दंड को जानबूझ कर गैर कानूनी तरीके से लेखा-प्रावधान (प्रोविजनिंग) के माध्यम से समायोजित कर हरिश शर्मा एजीएम का व्यक्तिगत जवाबदेही से बचाव किया, जिससे नियामकीय कार्रवाई का निवारक प्रभाव निष्प्रभावी हुआ।
शिकायतों में प्रबंध निदेशक पंकज सूद, हरिश शर्मा एजीएम, कुलदीप सिंह, एजीएम, राम पाल एजीएम सहित वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिकाओं पर प्रश्न उठाए गए हैं। दस्तावेज़ों के अनुसार, RBI ने धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग में देरी सहित नियामकीय उल्लंघनों पर ₹3.50 लाख का मौद्रिक दंड लगाया था, जो बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 की धारा 47A(1)(c) सहपठित धारा 46(4)(i) एवं 56 के तहत लगाया गया बताया गया है।
मौद्रिक दंड एक पुष्ट एवं व्यक्तिगत देनदारी होने के बावजूद, बाद की वित्तीय अवधि में इसे प्रावधान (प्रोविजनिंग) के ज़रिये संस्थागत खातों में समाहित कर दिया गया, जबकि हरीश शर्मा एजीएम की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने की दंड की वसूली प्रक्रिया जानबूझ कर शुरू नहीं की गई। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा के अनुसार यह कदम प्रूडेंशियल नॉर्म्स, लेखा मानकों और नियामकीय निर्देशों की भावना के विपरीत प्रतीत होता है तथा जमाकर्ताओं/सार्वजनिक धन का उपयोग कर व्यक्तिगत चूकों की लागत जोगिंद्रा बैंक पर डालने जैसा है। अधिवक्ता शर्मा ने यह भी कहा है कि इस पूरे घटनाक्रम पर रजिस्ट्रार, सहकारी समितियाँ (RCS), शिमला की ओर से इस मामले में पूरी जानकारी होने के बावजूद भी पर्याप्त आपत्ति/कार्रवाई न होना नियामकीय निष्क्रियता एवं सांठगांठ की ओर संकेत करता है। वहीं नाबार्ड और आर बी आई की क्षेत्रीय निगरानी पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में दावा किया गया है कि अतीत में ऐसे दंडों की वसूली संबंधित शाखा-स्तरीय अधिकारियों से की जाती रही, जबकि वर्तमान मामले में केवल हरीश शर्मा एजीएम को बचाने के लिए एकतरफा चयनात्मक नीति अपनाई गई।
दस्तावेज़ों के अनुसार, राम पाल (AGM) और कुलदीप सिंह (AGM) के विरुद्ध राज्य सतर्कता/पुलिस में पंजीकृत मामलों (जैसे FIR No. 45/2019, FIR No. 29/2023, तथा FIR No. 03/2025) का भी उल्लेख किया गया है, जिनकी जांच चल रही है। शिकायतकर्ता शर्मा का आरोप है कि इन पृष्ठभूमि तथ्यों के बावजूद भी हरीश शर्मा एजीएम के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक/वसूली कार्रवाई नहीं की गई।
कानूनी जानकारों के मुताबिक, यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो मामला कर्तव्य-उल्लंघन, गलत अभिलेख/लेखा-प्रस्तुति, विश्वासभंग और षड्यंत्र जैसे पहलुओं तक जा सकता है। शिकायत में विजिलेंस जांच, व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने, दंड राशि की वसूली जिम्मेदार अधिकारियों से करने, तथा आवश्यक होने पर आपराधिक संदर्भ भेजने की मांग की गई है।
अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने केंद्रीय विजिलेंस नाबार्ड से प्रार्थना की है कि संबंधित अधिकारी हरीश शर्मा एजीएम, पंकज सूद, प्रबंध निदेशक, डायरेक्टर्स, चेयरमैन एवं रजिस्ट्रार कॉपरेटिव सोसाइटी, शिमला के संबंधित अधिकारीयों पर आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई की जाए।

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