जोगिंद्रा सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक पर गंभीर आरोप, टैक्स चोरी और घोटालों की शिकायत

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2005 से वित्तीय हेराफेरी का दावा, कई उच्च पदों तक पहुंची शिकायत

FIR, OTS और सस्पेंस खातों पर सवाल—फोरेंसिक जांच की मांग तेज

एएम नाथ। सोलन : हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित जोगिंद्रा सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक (JCCB) एक बड़े विवाद के केंद्र में आ गया है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा द्वारा दायर की गई शिकायत में बैंक प्रबंधन पर वर्ष 2005 से अब तक सुनियोजित तरीके से वित्तीय हेराफेरी, टैक्स चोरी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यह मामला अब स्थानीय स्तर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है।
अधिवक्ता शर्मा ने अपनी शिकायत केवल आयकर विभाग तक सीमित नहीं रखी, बल्कि इसे देश के कई शीर्ष संवैधानिक और प्रशासनिक पदाधिकारियों को भी भेजा है। इनमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री, वित्त मंत्री सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। साथ ही NABARD और राज्य के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को भी इस मामले से अवगत कराया गया है, जिससे इसकी गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
शिकायत में आरोप है कि बैंक प्रबंधन ने “प्रोविजनिंग”, “राइट-ऑफ” और “वन टाइम सेटलमेंट (OTS)” जैसी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर बैंक की वास्तविक आय को छिपाया। इससे न केवल बैंक की वित्तीय स्थिति को गलत तरीके से पेश किया गया, बल्कि सरकार को देय कर में भी भारी कमी दिखाई गई। अधिवक्ता का दावा है कि इससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है।
सबसे गंभीर आरोप “सस्पेंस इंटरेस्ट” को लेकर लगाए गए हैं। शिकायत के अनुसार, 15 करोड़ रुपये से अधिक की ब्याज आय को जानबूझकर सस्पेंस खातों में डालकर लाभ-हानि खाते में शामिल नहीं किया गया। इससे टैक्स चोरी के साथ-साथ बैंक के एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) को भी कृत्रिम रूप से कम दिखाया गया।
OTS योजनाओं को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि बड़े ऋण खातों को बेहद कम राशि पर निपटाया गया, जिससे कुछ चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचा और बैंक को नुकसान हुआ। अधिवक्ता ने इसे “घोटालों को वैधता देने का माध्यम” बताया है।
शिकायत में बैंक के कई अधिकारियों के नाम भी शामिल किए गए हैं, जिन पर मिलीभगत से इन अनियमितताओं को अंजाम देने का आरोप है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि दर्ज आपराधिक मामलों (FIRs) के बावजूद संबंधित अधिकारियों को सेवा में बनाए रखा गया और उन्हें पदोन्नति तक दी गई।
FIR संख्या 45/2019, 29/2023 और 00003/2025 जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए अधिवक्ता ने सवाल उठाया है कि गंभीर धाराओं में केस दर्ज होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इससे बैंक प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर संदेह और गहरा हो गया है।
अधिवक्ता का यह भी आरोप है कि इतने बड़े स्तर पर हेराफेरी बिना उच्च प्रबंधन और नियामक संस्थाओं की जानकारी के संभव नहीं है। उन्होंने इसे एक “संगठित भ्रष्ट तंत्र” बताया है।
मामले की निष्पक्ष जांच के लिए अधिवक्ता ने वर्ष 2005 से अब तक के सभी वित्तीय रिकॉर्ड्स की फोरेंसिक जांच, सस्पेंस खातों और OTS फाइलों की गहन पड़ताल तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला न केवल एक बड़े बैंक घोटाले का खुलासा करेगा, बल्कि वित्तीय प्रणाली में गहराई तक फैले भ्रष्टाचार की गंभीर तस्वीर भी सामने ला सकता है।

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