भ्रष्टाचार के आरोपों और महाभियोग से पहले इस्तीफा देने वाले 5 प्रमुख जज

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भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में शुक्रवार का दिन एक और बड़े विवाद के समापन का गवाह बना। दिल्ली स्थित आवास पर जले हुए नोट मिलने के मामले में चर्चा में रहे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने आखिरकार अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

इसके साथ ही वे उन न्यायाधीशों की सूची में शामिल हो गए हैं जिन्होंने महाभियोग (Impeachment) की कार्यवाही के दौरान या उससे ठीक पहले पद छोड़ दिया।

कानून के जानकारों के अनुसार, इस्तीफे के बाद अब उनके खिलाफ चल रही संसदीय जांच स्वतः ही समाप्त हो जाएगी, जिससे आरोपों की पुष्टि होना अब और भी कठिन हो गया है। आइए जानते हैं उन न्यायाधीशों के बारे में जिन्होंने विवादों के बीच पद त्यागा:

दिल्ली हाई कोर्ट में पदस्थापना के दौरान मार्च 2025 में उनके आवास पर कथित तौर पर नकदी जलने की घटना सामने आई थी। इसके बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया। महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने के बाद उन्होंने “गहरी पीड़ा” व्यक्त करते हुए इस्तीफा दे दिया।

सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे दिनाकरण पर तमिलनाडु के कांचीपुरम में लगभग 197 एकड़ सरकारी जमीन हड़पने और आय से अधिक संपत्ति के गंभीर आरोप थे। सुप्रीम कोर्ट में उनकी पदोन्नति की सिफारिश के दौरान ये मामले खुले। जांच समिति द्वारा दोषी पाए जाने पर महाभियोग से ठीक पहले 29 जुलाई 2011 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन पर 33.23 लाख रुपये की हेराफेरी का आरोप था। राज्यसभा ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया था, जिससे वे भारत के पहले ऐसे जज बने जिनके खिलाफ एक सदन में महाभियोग सफल रहा। हालांकि, लोकसभा में सुनवाई से पहले ही 1 सितंबर 2011 को उन्होंने पद छोड़ दिया।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वी. रामास्वामी स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे जज थे जिनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई। उन पर पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए सरकारी धन का व्यक्तिगत विलासिता (आलीशान फर्नीचर, विदेश यात्रा) पर खर्च करने का आरोप था। 1991 में लोकसभा में प्रस्ताव पारित नहीं हो सका, लेकिन नैतिक दबाव के चलते 1994 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

हैदराबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे दिलीप भोसले पर कुछ प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगे थे। हालांकि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के ठोस सबूत नहीं थे, लेकिन उन्होंने विवादों से बचने और अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए अपनी सेवानिवृत्ति की तारीख पर ही इस्तीफा दे दिया था।

भारत में संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत किसी न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है।

प्रस्ताव: लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव अध्यक्ष/सभापति को दिया जाता है।

जांच समिति: आरोपों की जांच के लिए 3 सदस्यीय समिति (सुप्रीम कोर्ट के जज, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद) गठित की जाती है।

बहुमत: यदि समिति दोषी पाती है, तो संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 और कुल सदस्य संख्या का 50% से अधिक) से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।

राष्ट्रपति का आदेश: अंत में राष्ट्रपति के आदेश से न्यायाधीश को पदमुक्त किया जाता है।

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