जोगिंद्रा बैंक की एजीएम में ₹ 3.66 करोड़ राइट-ऑफ का मामला गरमाया

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अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने उठाई जांच की मांग

एएम नाथ। सोलन :  सोलन जिले के जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में कथित करोड़ों रुपये के वित्तीय घोटालों और बैंकिंग अनियमितताओं का नया मामला सामने आया है। इस संबंध में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा, एडवोकेट द्वारा नाबार्ड के मुख्य सतर्कता अधिकारी तथा आयकर विभाग को एक विस्तृत शिकायत भेजी गई है। शिकायतकर्ता शर्मा ने बैंक के कई वरिष्ठ अधिकारियों पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, बैंक धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं को छिपाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। अधिवक्ता शर्मा के अनुसार यह मामला अब केवल विभागीय लापरवाही का नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक षड्यंत्र का रूप ले चुका है।
शिकायतकर्ता शर्मा द्वारा भेजी गई शिकायत के अनुसार 18 फरवरी 2026 को सोलन के होटल में आयोजित जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक की वार्षिक आम सभा में लगभग ₹ 3.66 करोड़ रुपये की इंटर-ब्रांच डिफरेंस राशि को स्थायी रूप से राइट-ऑफ करने का प्रस्ताव रखा गया। अधिवक्ता शर्मा ने इस प्रस्ताव को बैंकिंग प्रणाली के दुरुपयोग और वित्तीय हेराफेरी को छिपाने का संगठित व मिलीभगत से किया गया प्रयास बताया है। अधिवक्ता शर्मा का आरोप है कि इस राशि को वर्षों तक जानबूझकर लंबित रखा गया ताकि बैंक के भीतर हुई बड़ी वित्तीय गड़बड़ियों को छिपाया जा सके।
शिकायत में विशेष रूप से बैंक के राम पॉल, एजीएम की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अधिवक्ता शर्मा के अनुसार राम पॉल लंबे समय तक बैंक के रिकन्सिलिएशन सेक्शन से जुड़े रहे और इसी दौरान करोड़ों रुपये की अनियमितताएं सामने आईं, जिनकी न तो उचित जांच की गई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई। अधिवक्ता शर्मा ने यह भी आरोप लगाया है कि बैंक ने रिकन्सिलिएशन सेक्शन में तैनात कर्मचारियों पर करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन इसके बावजूद इंटर-ब्रांच खातों का मिलान वर्षों तक लंबित रखा गया, जिससे वित्तीय हेराफेरी की आशंका और मजबूत होती है।
शिकायत में यह भी खुलासा किया है कि वर्ष 2010 में सेवड़ा चंडी शाखा से नरेश चंद के नाम पर लगभग 10.50 लाख रुपये का कमर्शियल वाहन ऋण तथा 50 हजार रुपये का व्यक्तिगत ऋण राम पॉल शाखा प्रबंधक द्वारा स्वीकृत किया गया था। अधिवक्ता शर्मा का आरोप है कि ये ऋण बैंकिंग नियमों की अवहेलना करते हुए बिना पर्याप्त सुरक्षा के जारी किए गए और बाद में जल्द ही एनपीए बन गए।शिकायतकर्ता के अनुसार इन ऋण मामलों को जानबूझकर जांच से बाहर रखा गया और अब राम पॉल, एजीएम को बचाने के लिये कथित रूप से इन्हें स्पेशल राइट-ऑफ स्कीम के माध्यम से बंद करने की कोशिश की जा रही है।
अधिवक्ता शर्मा ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि इस पूरे मामले में कुलदीप सिंह, एजीएम, हरीश शर्मा एजीएम और गुरमीत सिंह, एस एम सहित बैंक के कई अधिकारी कथित रूप से शामिल हैं और बैंक के चेयरमैन, बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स तथा अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर इन मामलों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। अधिवक्ता शर्मा के अनुसार राम पॉल एजीएम के खिलाफ वर्ष 2005 से अब तक बैंक में 43 करोड़ रुपये से अधिक के संदिग्ध ऋण और वित्तीय अनियमितताओं के मामले सामने आए हैं, जिनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने NABARD के मुख्य सतर्कता विभाग से मांग की है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया जाए और बैंक की एजीएम की वीडियोग्राफी सहित सभी रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाएं। इसके साथ ही अधिवक्ता शर्मा ने आयकर विभाग से भी संबंधित अधिकारियों और आरोपित व्यक्तियों की आय और संपत्तियों की जांच करने की मांग की है और इस शिकायत की प्रतियां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री, वित्त मंत्री, हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, डीजीपी, राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, आरबीआई तथा अन्य कई संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकारियों को भी भेजी गई हैं। अधिवक्ता शर्मा का कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो बैंकिंग प्रणाली में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग से जुड़े कई बड़े घोटाले उजागर हो सकते हैं।

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