प्रशिक्षुओं को स्वर : व्यंजन और विशेष चिह्नों का गहन अभ्यास , टांकरी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का तृतीय दिवस संपन्न

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चम्बा क्षेत्रीय टांकरी स्वरूप पर विशेष बल

एएम नाथ। सलूणी (चम्बा) : हिम संस्कृति शोध संस्थान एवं राजकीय महाविद्यालय सलूणी जिला चम्बा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की टांकरी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का तृतीय दिवस अत्यंत उत्साह और ज्ञानवर्धक गतिविधियों के साथ संपन्न हुआ। 15 अप्रैल 2026 से प्रारम्भ इस कार्यशाला में प्रतिभागियों की निरंतर बढ़ती सहभागिता देखने को मिल रही है।
कार्यशाला के तीसरे दिन का आरम्भ टांकरी मातृका की कक्षा से हुआ, जिसमें प्रशिक्षुओं द्वारा पूर्व दिवस में दिए गए गृहकार्य का सूक्ष्म अवलोकन किया गया। प्रशिक्षकों ने प्रत्येक प्रतिभागी की त्रुटियों को चिन्हित कर उन्हें सुधारने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया। इसके पश्चात प्रतिभागियों को अभ्यास के लिए एक लेख में निहित स्वरों की पहचान करने का कार्य दिया गया, जिससे उनकी समझ और अधिक सुदृढ़ हो सके।
आगे की कक्षा में अनुस्वार ‘अं’, विसर्ग ‘अः’ तथा चन्द्रबिन्दु को टांकरी लिपि में लिखने की विधि सिखाई गई। साथ ही पहाड़ी भाषा को लिखने हेतु प्रयुक्त एक विशेष स्वर का भी परिचय कराया गया। इसके उपरांत व्यंजनों का अभ्यास प्रारम्भ हुआ, जिसमें क-वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), च-वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ) तथा ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) को टांकरी लिपि में लिखना सिखाया गया।
विशेष रूप से चम्बा क्षेत्र में प्रचलित टांकरी लिपि के स्वरूप को समझाते हुए प्रशिक्षकों ने बताया कि विभिन्न क्षेत्रों में लिपि के रूपों में सूक्ष्म भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। प्रत्येक वर्ण की संरचना के पीछे के कारणों को स्पष्ट करने हेतु विभिन्न ऐतिहासिक और भौगोलिक संदर्भ भी प्रस्तुत किए गए।
प्रशिक्षण के दौरान ङ और ञ वर्णों के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। बताया गया कि ये वर्ण प्राचीन संस्कृत पाण्डुलिपियों में व्यापक रूप से मिलते हैं, किन्तु वर्तमान लोकप्रयोग में भाषा ज्ञान के अभाव में इनका उपयोग कम हो गया है। उदाहरण स्वरूप ‘गङ्गा’ और ‘पञ्च’ जैसे शुद्ध रूपों के स्थान पर आज सामान्यतः सरलीकृत रूप लिखे जाते हैं।
अंत में यह भी रेखांकित किया गया कि भाषा को शुद्ध एवं वैज्ञानिक ढंग से लिखने के लिए सम्पूर्ण वर्णमाला का ज्ञान तथा संस्कृत का आधारभूत अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। कक्षा के समापन पर प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया, जिससे उनका उत्साह और अधिक बढ़ा।
कार्यशाला के इस ज्ञानवर्धक सत्र ने प्रतिभागियों को टांकरी लिपि के प्रति और अधिक जागरूक एवं प्रेरित किया।

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