सतलुज’ विवाद : पंजाब का दर्दनाक अतीत चुनिंदा ढंग से पेश नहीं किया जा सकता : रवनीत बिट्टू

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चंडीगढ़, 12 जुलाई :  केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने रविवार को कहा कि दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ के निर्माता ‘विवादित दावों को स्थापित इतिहास’ के तौर पर पेश कर ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ की आड़ नहीं ले सकते।

बिट्टू ने कहा कि पंजाब का दर्दनाक अतीत कोई ऐसी पटकथा नहीं है जिसे किसी विमर्श के हिसाब से चुनिंदा ढंग से संपादित किया जा सके। हनी त्रेहन के निर्देशन में बनी फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की ज़िंदगी पर आधारित है, जिन्होंने 1984 और 1994 के बीच पंजाब में हजारों ‘अज्ञात’ शवों के ‘गैर-कानूनी ढंग से किये गये’ अंतिम संस्कार की जांच की थी।

सितंबर 1995 में अमृतसर में खालड़ा का उनके घर के सामने से अपहरण कर लिया गया था। बाद में पता चला कि उनकी हत्या कर दी गई थी, लेकिन उनका शव कभी नहीं मिला। शुरू में इस फिल्म का शीर्षक ‘पंजाब ’95’ था जिसे बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया। इस फिल्म को तीन जुलाई को रिलीज होने के दो दिन बाद ही भारत में ओटीटी मंच ‘जी 5’ से हटा दिया गया था, क्योंकि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सुरक्षा संबंधी चिंताएं जताई थीं।

रेलवे और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री बिट्टू ने एक बयान में कहा, ”मैं ‘सतलुज’ फिल्म के निर्माता और निर्देशक को चुनौती देता हूं कि वे पंजाब के लोगों के सामने वे सभी दस्तावेज़ी सबूत, सरकारी रिकॉर्ड, न्यायिक निष्कर्ष और प्रमाणित डेटा रखें, जिनसे 25,000 लोगों के लापता होने या उन्हें गैर-कानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किये जाने की बात स्थापित हो जैसा कि फिल्म में दर्शाया गया है। उन्होंने पूछा, “अगर यह आंकड़ा सिर्फ एक अनुमान या आरोप है, तो इसे एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के तौर पर क्यों पेश किया गया? दर्शकों को यह क्यों नहीं बताया गया कि यह संख्या किसी अंतिम न्यायिक फैसले से पक्के तौर पर साबित नहीं हुई है?

बिट्टू, पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं। बेअंत सिंह की 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में उच्च सुरक्षा वाले सचिवालय में हत्या कर दी गई थी। बिट्टू ने कहा, ”मैं ‘सतलुज’ के निर्माताओं से अपील करता हूं कि वे 25,000 के आंकड़े के पीछे के दस्तावेज़ी आधार को उचित समय के भीतर सार्वजनिक करें। अगर वे विश्वसनीय और सत्यापन योग्य सबूतों के साथ अपने दावे को साबित नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें पंजाब के लोगों को यह स्पष्टीकरण देना चाहिए कि यह आंकड़ा आधिकारिक तौर पर सत्यापन योग्य आंकड़ा नहीं है।

उन्होंने कहा, “हम यह सुनिश्चित करने के लिए सभी उचित कानूनी और संवैधानिक उपायों पर विचार करेंगे कि देश के सामने ऐतिहासिक तथ्यों को गलत तरीके से पेश न किया जाए।। उन्होंने कहा, ”पंजाब के इतिहास को चुनिंदा कहानियों के जरिए फिर से नहीं लिखा जा सकता। दुष्प्रचार पर सच, कल्पना पर तथ्य और भावनाओं पर सबूतों की जीत होनी चाहिए। बिट्टू का यह बयान ऐसे समय में आया जब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) समेत पंजाब के कई सिख संगठनों और राजनीतिक दलों ने ‘जी5’ मंच से ‘सतलुज’ फिल्म को हटाये जाने की कड़ी आलोचना की।

उन्होंने कहा कि यह फिल्म भारत को सरकार के ‘सबसे काले अध्यायों’ में से एक का सामना करने के लिए मजबूर करती है और ‘इतिहास का सामना ईमानदारी से किया जाना चाहिए, न कि सेंसरशिप के जरिए उसे दबाया जाना चाहिए।’

हालांकि, बिट्टू ने कहा कि पंजाब के लोग ‘उतनी ही परेशान करने वाली बातों को छोड़ दिये जाने और पंजाब के सबसे काले दौर को चुनिंदा तरीके से दिखाये जाने’ को लेकर जवाब पाने के हकदार हैं। लुधियाना के सांसद बिट्टू ने पूछा, ”आतंकवाद से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए पंजाब पुलिस के जवानों, सुरक्षा बलों और अनगिनत बहादुर नागरिकों के भारी बलिदान को कम करके क्यों दिखाया गया? आतंकवादी हिंसा से बर्बाद हुए हज़ारों परिवार इस कहानी से लगभग गायब क्यों रहे? बिट्टू ने यह भी कहा कि किसी भी ज़िम्मेदार फ़िल्म निर्माता को यह अधिकार नहीं है कि वह ‘विवादित आंकड़े को निर्विवाद सच के तौर पर पेश करके इतिहास को तोड़े-मरोड़े।

वैसे नवंबर 2005 में एक विशेष सीबीआई अदालत ने खालड़ा के अपहरण और हत्या के मामले में पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह और सहायक उपनिरीक्षक अमरजीत सिंह को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी, जबकि चार अन्य पुलिसकर्मियों को सात-सात साल की जेल की सज़ा दी गई थी। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2007 में अमरजीत सिंह को बरी कर दिया और बाकी चार दोषियों की सज़ा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी। शीर्ष अदालत ने 2011 में इस फ़ैसले को बरकरार रखा।

 

 

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