19 साल बाद इंसाफ : हार्ट सर्जरी का खर्च वापस, आपात स्थिति में निजी अस्पताल में एआईआईएमएस रेट लागू नहीं

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चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में पंजाब सरकार की अपील खारिज करते हुए एक सरकारी शिक्षक को 19 साल पुराने चिकित्सा प्रतिपूर्ति विवाद में पूरी राहत दे दी है।

जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने अपने फैसले में जिला जज, मानसा के वर्ष 2006 के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें शिक्षक भूपिंदर सिंह को दिल की आपात सर्जरी पर हुए पूरे खर्च की प्रतिपूर्ति का अधिकार दिया गया था।

भूपिंदर सिंह, जो वर्ष 2002 में राजकीय प्राथमिक विद्यालय, फूस मंडी, मानसा में अध्यापक के पद पर कार्यरत थे, को नवंबर 2002 में गंभीर हृदय रोग के चलते एंजियोग्राफी के बाद ओपन हार्ट सर्जरी की तत्काल आवश्यकता बताई गई। सरकारी प्रक्रिया के तहत उन्हें नई दिल्ली स्थित एस्कार्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर रेफर किया गया, जहां 18 से 30 नवंबर 2002 के बीच उनकी कोरोनरी आर्टरी बाइपास सर्जरी हुई।

सरकार के फैसले को बताया गलत

इस दौरान उनका कुल चिकित्सा खर्च 2,20,677 रुपये तथा अतिरिक्त 11,000 रुपये आया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एस्कार्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट पंजाब सरकार द्वारा वर्ष 1991 में जारी पत्र के तहत ओपन हार्ट सर्जरी के लिए मान्यता प्राप्त अस्पताल है। इसी सूची में क्रिश्चियन मेडिकल कॉालेज, लुधियाना तथा अपोलो हास्पिटल, मद्रास का नाम भी शामिल था। ऐसे में सरकार द्वारा यह तर्क देना कि बिलों को केवल एआईआईएमएस दरों तक सीमित किया जाना चाहिए, पूरी तरह से गलत और अवैध है।

कोर्ट ने कहा कि जब किसी सरकारी कर्मचारी को सरकारी माध्यम से, जीवन-रक्षक आपात स्थिति में, किसी मान्यता प्राप्त निजी अस्पताल में रेफर किया गया हो, तो उसकी चिकित्सा प्रतिपूर्ति को एआईआईएमएस की दरों तक सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत ने पंजाब हेल्थ सिस्टम कारपोरेशन द्वारा जारी रेफरल दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि मामला अत्यंत गंभीर था और इसमें देरी जीवन के लिए खतरा बन सकती थी।

कोर्ट ने 1995 के सरकारी निर्देशों का किया उल्लेख

कोर्ट ने 1995 के सरकारी निर्देशों का भी उल्लेख किया, जिनमें स्पष्ट किया गया है कि जानलेवा आपात परिस्थितियों में चिकित्सा बोर्ड की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं होती।फैसले में कोर्ट ने मामले में हुई असामान्य देरी पर भी कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ऐसे मामलों का 19 वर्षों बाद निपटारा होना अत्यंत पीड़ादायक है।

वर्ष 2002 से यह व्यक्ति अपने वैध प्रतिपूर्ति के लिए भटक रहा था, जिसे तत्काल हल किया जाना चाहिए था। अदालत ने सरकार को चिकित्सा प्रतिपूर्ति नीतियों में अधिक मानवीय और उदार दृष्टिकोण अपनाने की भी सलाह दी। न्यायालय ने कहा, दर्द और संकट की स्थिति में कोई भी व्यक्ति अस्पताल चुनाव की स्थिति में नहीं होता। वह केवल अपने जीवन को बचाने के लिए निकटतम और उपलब्ध सुविधा की ओर भागता है। ऐसे में सरकार को कठोर नहीं, बल्कि सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाना चाहिए।

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