गुरमीत सिंह पर अरबों रुपए के घोटालों के रिकॉर्ड दबाने के आरोप, मामला CBI को सौंपने की मांग

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जोगिंद्र सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, सोलन के पूर्व रिकवरी एवं लॉ प्रभारी गुरमीत सिंह पर साठगांठ, रिकॉर्ड दबाने और चुनिंदा कर्जदारों को लाभ पहुंचाने के आरोप

वरिष्ठ बैंक अधिकारियों, निदेशक मंडल व नियामक अधिकारियों पर साठगांठ का आरोप

एएम नाथ। सोलन/शिमला ;जोगिंद्र सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, सोलन से जुड़े कथित अरबों रुपये के बैंकिंग घोटाले का मामला अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सी बी आई) को सौंपे जाने की मांग के साथ तूल पकड़ता जा रहा है। इस संबंध में मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय/हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय) द्वारा सक्षम प्राधिकारियों को विस्तृत शिकायत/प्रतिवेदन सौंपा गया है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गुरमीत सिंह, पूर्व प्रभारी (रिकवरी एवं लॉ), जोगिंद्रा सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक मुख्यालय, सोलन, ने बैंक प्रबंधन, निदेशक मंडल, चेयरमैन तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ साठगांठ कर बड़े एनपीए खातों की जानबूझकर वसूली नहीं की, रिकॉर्ड दबाए, और लॉस-मेकिंग सेटलमेंट/ओटीएस के जरिए अपने एवं बैंक के अन्य अधिकारियों के कथित “करीबी/परिचित” कर्जदारों को अनुचित लाभ पहुंचाया, जिससे बैंक और सार्वजनिक धन को अरबों रुपये का नुकसान हुआ। गुरमीत सिंह ने बैंक प्रबंधन, निदेशक मंडल, चेयरमैन और चुनिंदा वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मिलकर बैंक को निजी दुकान की तरह चलाया और वर्षों तक अरबों रुपये के एनपीए खातों को जानबूझकर दबाए रखा।
शिकायत में कुलदीप सिंह (ए जी एम), हरीश शर्मा ( ए जी एम), राम पॉल (ए जी एम), जगदीप शर्मा (ब्रांच मैनेजर), दीपक सूद (ब्रांच मैनेजर), उमराज ठाकुर (ब्रांच मैनेजर), नीना शर्मा (ब्रांच मैनेजर) सहित अन्य अधिकारियों की भूमिकाओं की जांच की मांग की गई है। आरोप है कि वर्ष 2005 से अब तक विभिन्न शाखाओं में एक संगठित गिरोह की तरह कार्यप्रणाली अपनाई गई, जिसमें रिकवरी रोकी गई, एनपीए दबाए गए, तथा पसंदीदा उधारकर्ताओं को नियमों के विरुद्ध राहत दी गई।
मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता द्वारा दायर विस्तृत शिकायत के अनुसार, गुरमीत सिंह अकेले नहीं, बल्कि बोर्ड-स्तरीय संरक्षण प्राप्त एक संगठित गिरोह का हिस्सा है। आरोप है कि जिन प्रबंध निदेशकों और निदेशकों का दायित्व बैंक के हितों की रक्षा करना था, उन्होंने ही जानबूझकर आंखें मूंदकर, फाइलों पर मौन स्वीकृति देकर और आपत्तियों को दबाकर इस कथित घोटाले को वर्षों तक फलने-फूलने दिया।
प्रथम अपीलीय प्राधिकारी एवं तत्कालीन प्रबंध निदेशक पद्मा छोदोन ने आरटीआई के तहत मांगी गई महत्वपूर्ण सूचनाएं जानबूझकर उपलब्ध नहीं कराईं। आरोप है कि केवल औपचारिक निरीक्षण का निमंत्रण देकर वास्तविक दस्तावेजों और तथ्यों के खुलासे से जानबूझ कर बचने का प्रयास किया गया, ताकि बड़े घोटाले, एनपीए हेरफेर और बोर्ड-स्तरीय निर्णय सार्वजनिक न हो सकें।
एक अन्य गंभीर पहलू यह भी है कि नाबार्ड (शिमला), आरबीआई (शिमला), रजिस्ट्रार को-ऑपरेटिव सोसाइटीज, शिमला जैसे नियामक एवं पर्यवेक्षणीय संस्थानों तथा अन्य राज्य/जिला स्तरीय प्रशासनिक कार्यालयों ने शिकायतें प्राप्त होने के बावजूद समुचित पर्यवेक्षणीय/दंडात्मक कार्रवाई नहीं की, और दस्तावेज मिलने के बावजूद आंखें मूंदे रखीं आरोप है कि यह निष्क्रियता मात्र लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर संरक्षण, शील्डिंग और संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करती है, जिससे यह घोटाला वर्षों तक फलता-फूलता रहा।
शिकायत में एमएमएसवाई योजना के अंतर्गत रजत गुप्ता और नीतू देवी से जुड़े ऋण मामलों, लगभग 22 लाख रुपये की सब्सिडी के कथित दुरुपयोग/रोके जाने, तथा गुरमीत सिंह द्वारा चार्टर्ड अकाउंटेंट की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट को दरकिनार करने, और संदिग्ध/फ्रॉड खाते को ‘क्लीन चिट’ देने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि इन मामलों में तत्कालीन प्रबंध निदेशक ताशी सैंडुप (HAS) सहित वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी जांच आवश्यक है।
उल्लेखनीय है कि शिकायत के अनुसार FIR संख्या 00003/2025, धारा 409, 420, 120-B के अंतर्गत राज्य सतर्कता, सोलन में कुलदीप सिंह (ए जी एम) व अन्य के विरुद्ध दर्ज है, जिसकी जांच प्रगति पर बताई गई है। शिकायतकर्ता का दावा है कि उनके पास दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर सीबीआई द्वारा स्वतंत्र, समयबद्ध और निष्पक्ष जांच, फॉरेंसिक/स्पेशल ऑडिट, एनपीए फाइलों, ओटीएस/राइट-ऑफ, वैल्यूएशन रिपोर्ट्स तथा मनी ट्रेल की जांच कराए जाने की आवश्यकता है।
शिकायत में अंततः मांग की गई है कि CBI से प्राथमिकी दर्ज कर व्यापक जांच कराई जाए, ताकि सार्वजनिक धन की सुरक्षा, दोषियों की पहचान, और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। संबंधित संस्थानों/अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
शिकायतकर्ता मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्होंने पूर्व में बार-बार संबंधित जांच एजेंसियों और प्रशासन से अनुरोध किया कि इन भ्रष्ट अधिकारियों तथा उनके परिवार के सदस्यों के पासपोर्ट तत्काल जब्त किए जाएं, क्योंकि इस बात की प्रबल आशंका है कि ये आरोपी किसी भी समय भारत छोड़कर फरार हो सकते हैं।
शिकायत में आरोप है कि इतनी गंभीर चेतावनियों के बावजूद आज तक किसी भी जांच एजेंसी ने इस अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया। इसे जानबूझकर की गई घोर लापरवाही बताते हुए यह भी कहा गया है कि यदि आरोपी अधिकारी या उनके परिवार के सदस्य देश से फरार होते हैं, तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी प्रशासन, जांच एजेंसियों और मामले से निपटने वाले अधिकारियों की होगी।
शिकायत के अनुसार, आरोपियों को खुला छोड़ना और पासपोर्ट जब्ती जैसे आवश्यक कदम न उठाना, पूरे मामले को कमजोर करने और अरबों रुपये के घोटाले के आरोपियों को बच निकलने का अवसर देने के समान है।

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