गुल्लरवाला में श्रीमद्भागवत कथा छटा दिन : कथावाचक ऋषि गौतम द्वारा नंद उत्सव और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़े अनेक प्रसंग सुनाए

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बद्दी, 11 जून (तारा) : बद्दी उपमंडल के गुल्लरवाला के प्रसिद्ध दुर्गा माता मंदिर परिसर में पंचायत के समस्त ग्रामवासियों द्वारा श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के छठे दिन क्षेत्र के प्रसिद्ध कथावाचक ऋषि गौतम द्वारा अपने मुखारविंद से प्रवचनों की वर्षा की जा रही है। कथा में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। स्थानीय महिलाएं अधिक संख्या में बढ़चढ़ भाग लेती है।

शनिवार को कथावाचक ने नंद उत्सव व भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान कृष्ण जब केवल छह दिन के थे, तब उन्होंने कंस के भेजे गए मायावी राक्षस पूतना का वध किया था। पूतना गोकुल में सुंदर रूप बदलकर बाल कृष्ण को विषैला दूध पिलाकर मारने आई थी, लेकिन कृष्ण ने दूध के साथ-साथ उसके प्राण भी चूस लिए, जिससे उसका विशालकाय राक्षसी रूप प्रकट हो गया।पूतना वध की यह पौराणिक कथा सनातन धर्म और भागवत पुराण में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पूतना एक सुंदर स्त्री का रूप धरकर गोकुल पहुँची और यशोदा मैया की अनुपस्थिति में कृष्ण को अपनी गोद में ले लिया। उसने अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा रखा था। बाल कृष्ण ने पूतना के विषैले दूध को पीने के साथ-साथ उसके प्राण भी खींचने शुरू कर दिए। अत्यधिक पीड़ा के कारण पूतना अपने असली (राक्षसी) रूप में आ गई। इस प्रकार पूतना को सीधे भगवान के हाथों मोक्ष प्राप्त हुआ।
कथावाचक ने बताया कि कंस ने अपने वध की भविष्यवाणी से भयभीत होकर नन्हे कृष्ण को मारने के लिए कई असुर भेजे थे। इन असुरों में से दो प्रमुख थे शकटासुर और तृणावर्त। इन दोनों का वध भगवान कृष्ण ने अपनी बाल अवस्था में ही अद्भुत लीला दिखाते हुए किया था। एक दिन जब कृष्ण तीन महीने के थे, माता यशोदा ने उन्हें एक पालने में लिटाकर एक गाड़ी (शकट) के नीचे रख दिया और शुभ अनुष्ठान करने लगीं। तभी कंस द्वारा भेजा गया शकटासुर नाम का असुर उस गाड़ी में प्रवेश कर गया। बालक कृष्ण की नींद अचानक खुल गई और वे अपने छोटे-छोटे पैर पटकने लगे। उनके पैर के एक हल्के धक्के से ही असुर की वह गाड़ी पलट गई, जिसके पहिये और धुरे टूट गए। इस प्रकार असुर का अंत हो गया।
उन्होंने बताया कि एक अन्य दिन, जब माता यशोदा कृष्ण को अपनी गोद में लिए दुलार रही थीं तभी कंस का एक अन्य अनुचर, तृणावर्त असुर, बवंडर (तूफान) का रूप लेकर वहाँ आ पहुँचा। तृणावर्त, माता यशोदा की गोद से नन्हे कृष्ण को छीनकर आकाश में बहुत ऊँचा उड़ गया। जब वह काफी ऊपर पहुँच गया, तब बाल कृष्ण ने अपने भारी वजन से उस असुर की चाल रोक दी। बाल कृष्ण ने मुष्टिका का प्रहार किया तो असुर गोकुल की धरती पर पत्थरों पर गिरकर चकनाचूर हो गया। गर्गाचार्य द्वारा भगवान के नामकरण के बारे में भी बताया।
इसके पश्चात कथावाचक ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की माखन चोरी लीला ब्रज में उनकी बालपन की सबसे प्रसिद्ध और मनमोहक घटनाओं में से एक है। इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य गोपियों के अहंकार को मिटाना, प्रेम भाव बढ़ाना और उन्हें अपनी शुद्ध भक्ति (प्रेम) में लीन करना था। इस लीला के माध्यम से भगवान कृष्ण ने यह संदेश दिया कि उन्हें सांसारिक वस्तुओं (माखन) से अधिक भक्तों का शुद्ध, निर्मल और निष्कपट प्रेम (भक्ति) प्रिय है।
इस अवसर पर मंधाला वार्ड से नव निर्वाचित जिला परिषद सदस्य राज कुमार चौधरी के अलावा गुल्लरवाला व लेही पंचायत के सैंकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।

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