एएम नाथ। शिमला, 29 सितंबर। नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कांग्रेस पर चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का माहौल बनाने का आरोप लगाया। मंगलवार को शिमला में प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हासिल करने के प्रयास सफल नहीं होने के कारण कांग्रेस और उसके सहयोगी दल निराश हैं।
जयराम ठाकुर ने कहा कि चुनाव आयोग देश में चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था है। उन्होंने कांग्रेस नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि एक ओर वे संविधान की बात करते हैं और दूसरी ओर चुनाव आयोग पर लगातार सवाल उठाते हैं।
‘प्रेजेंटेशन से आरोप सच नहीं हो जाता’
राहुल गांधी की ओर से पीपीटी के माध्यम से लगाए गए आरोपों पर जयराम ठाकुर ने कहा कि किसी आरोप को केवल प्रस्तुत कर देने से वह सत्य साबित नहीं हो जाता। आरोपों के समर्थन में तथ्य और प्रमाण भी होने चाहिए।
उन्होंने चुनाव आयोग की हालिया बैठक का हवाला देते हुए कहा कि जिस पत्र को लेकर विवाद खड़ा किया गया, वह कैबिनेट सचिव को भेजा गया था और प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी की प्रशासनिक कार्यप्रणाली से संबंधित था। उनके अनुसार, इस पत्र का चुनाव आयोग के किसी नीतिगत विषय अथवा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से संबंध नहीं था।
उन्होंने कहा कि यदि बैठक में किसी तरह की असहमति दर्ज की गई होती तो वह आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा होती।
एमएस गिल का उदाहरण देकर कांग्रेस से सवाल
जयराम ठाकुर ने कांग्रेस को चुनाव आयोग के पुराने इतिहास की याद दिलाते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गिल सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस में शामिल हुए, राज्यसभा पहुंचे और केंद्र सरकार में मंत्री भी बने।
‘हर चुनाव में हार का कारण वोट चोरी है?’
वोट चोरी के आरोपों पर जयराम ठाकुर ने कांग्रेस से सवाल किया कि पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु जैसे राज्यों में लंबे समय से चुनावी हार का कारण भी क्या वोट चोरी को माना जाएगा।
उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में जब कांग्रेस की सरकारें बनीं, तब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल क्यों नहीं उठाए गए।
हिमाचल में कांग्रेस के प्रदर्शन पर जताई आपत्ति
हिमाचल प्रदेश में निर्वाचन विभाग के कार्यालय के बाहर कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी जयराम ठाकुर ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि बोर्ड पर कालिख पोतना, पुतला जलाना और कार्यालय को आग लगाने जैसी भाषा का इस्तेमाल किसी संवैधानिक संस्था की गरिमा के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी संस्था के निर्णयों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन विरोध का तरीका भी संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा के अनुरूप होना चाहिए।
