2027 चुनाव से पहले बड़ा सर्वे : CM से ज्यादा विधायकों से नाराज जनता, यूपी में 49% और पंजाब में 45.3% मतदाता मौजूदा…यूपी-पंजाब में टिकट बदलने का बढ़ सकता है दबाव :

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योगी और भगवंत मान की लोकप्रियता बरकरार; 2027 में स्थानीय उम्मीदवार बन सकता है बड़ा फैक्टर

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की राजनीतिक तैयारियां भले ही अभी शुरुआती दौर में हों, लेकिन मतदाताओं का मूड जानने वाले सर्वेक्षणों ने राजनीतिक दलों के लिए अभी से कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा आंकड़ों में सबसे अहम बात यह सामने आई है कि तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री या राज्य सरकार की तुलना में मौजूदा विधायकों को लेकर असंतोष अधिक दिखाई दे रहा है।

Vote Vibe के State Vibe सर्वे और अगस्त 2026 के India Today-CVoter Mood of the Nation सर्वे के आंकड़े संकेत देते हैं कि 2027 के चुनाव में केवल मुख्यमंत्री की लोकप्रियता या पार्टी का प्रदर्शन ही निर्णायक नहीं होगा। विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवार की छवि, जनता से उसका संपर्क और स्थानीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता भी चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकती है।

विधायकों से क्यों नाराज हैं मतदाता?

राजनीतिक विश्लेषक और Vote Vibe के संस्थापक अमिताभ तिवारी के मुताबिक, विधायकों के खिलाफ असंतोष की प्रमुख वजह उनकी जनता से बढ़ती दूरी है।

मतदाताओं की शिकायत है कि चुनाव जीतने के बाद कई विधायक नियमित रूप से अपने विधानसभा क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं रहते। स्थानीय लोगों के कामकाज और समस्याओं को सीधे देखने के बजाय कई बार उन्हें समर्थकों, रिश्तेदारों या अन्य लोगों के माध्यम से संभालने की कोशिश की जाती है।

चुनाव के दौरान जिस नेता तक पहुंच आसान होती है, जीतने के बाद उसी नेता तक पहुंचना मुश्किल हो जाना स्थानीय नाराजगी का बड़ा कारण बन सकता है।

तिवारी के अनुसार, तीनों राज्यों में करीब 10 से 15 प्रतिशत मतदाता उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और व्यवहार को ध्यान में रखकर मतदान कर सकते हैं। ऐसे में 2027 में उम्मीदवार का चयन राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

पंजाब में  विधायकों को लेकर नाराजगी

पंजाब की तस्वीर  राजनीतिक दलों के लिए कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। सर्वे के अनुसार 45.3 प्रतिशत मतदाता अपने मौजूदा विधायक से असंतुष्ट दिखाई दिए, जबकि करीब 32 प्रतिशत लोग विधायक के कामकाज से संतुष्ट नजर आए।

दूसरी ओर, भगवंत मान सरकार के प्रदर्शन को लेकर करीब 40 प्रतिशत लोगों ने संतुष्टि जताई। इससे पंजाब में भी मुख्यमंत्री और स्थानीय विधायक के मूल्यांकन के बीच अंतर दिखाई देता है।

भगवंत मान सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री चेहरा

मुख्यमंत्री पद की पसंद में पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री भगवंत मान सबसे आगे बताए गए हैं। उन्हें 40.1 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला, जबकि कांग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी 20.6 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहे।

यह आम आदमी पार्टी के लिए राहत का संकेत माना जा सकता है। हालांकि, पार्टी के स्थानीय विधायकों के खिलाफ असंतोष को नजरअंदाज करना उसके लिए जोखिम भरा हो सकता है।

पंजाब में AAP आगे, कांग्रेस भी मुकाबले में

वोट शेयर के अनुमान में आम आदमी पार्टी 34 प्रतिशत के साथ सबसे आगे दिखाई दे रही है। कांग्रेस को 30.2 प्रतिशत, भाजपा को 12.2 प्रतिशत और शिरोमणि अकाली दल को करीब 11.3 प्रतिशत समर्थन मिलने का अनुमान है।

AAP और कांग्रेस के बीच अंतर केवल 3.8 प्रतिशत अंक का है। ऐसे में पंजाब में मुकाबला अभी खुला हुआ माना जा सकता है। चुनाव से पहले गठबंधन, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और राजनीतिक परिस्थितियां इन आंकड़ों को बदल सकती हैं।

नशा और बेरोजगारी रहेंगे बड़े मुद्दे

पंजाब में मतदाताओं की प्रमुख चिंताओं में नशे की समस्या, बेरोजगारी और युवाओं का पलायन प्रमुख मुद्दे बताए जा रहे हैं।

इन मुद्दों का असर खासकर युवा मतदाताओं के बीच देखने को मिल सकता है। ऐसे में 2027 का चुनाव केवल राजनीतिक चेहरों के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि रोजगार, नशा, आर्थिक अवसर और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सर्वे में पंजाब में करीब 71.2 प्रतिशत मतदाताओं ने अपना वोट तय होने की बात कही है। हालांकि, चुनाव अभी दूर है और राजनीतिक घटनाक्रम के साथ मतदाताओं की पसंद बदलना संभव है।

यूपी में भी मौजूदा विधायकों के खिलाफ सबसे ज्यादा नाराजगी

सर्वे के मुताबिक, तीनों राज्यों में उत्तर प्रदेश के मौजूदा विधायकों के खिलाफ नाराजगी सबसे ज्यादा दिखाई दी। करीब 49 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने विधायक के कामकाज को लेकर असंतोष जताया, जबकि 27.9 प्रतिशत लोग अपने विधायक के प्रदर्शन से संतुष्ट नजर आए।

403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है। स्थानीय विधायक के खिलाफ नाराजगी कई सीटों पर पार्टी के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि, विधायकों के प्रति असंतोष का सीधा असर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता पर उसी अनुपात में दिखाई नहीं देता।

योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता कायम

मुख्यमंत्री पद की पसंद के सवाल पर 43.3 प्रतिशत लोगों ने योगी आदित्यनाथ का समर्थन किया, जबकि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव 35.5 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहे।

राज्य सरकार के कामकाज को लेकर भी करीब 41.8 प्रतिशत लोग संतुष्ट दिखाई दिए। इससे यह संकेत मिलता है कि मतदाता मुख्यमंत्री और अपने क्षेत्र के विधायक का मूल्यांकन अलग-अलग आधार पर कर रहे हैं।

यानी मुख्यमंत्री के प्रति समर्थन बना रहने के बावजूद स्थानीय विधायक के खिलाफ नाराजगी भाजपा के लिए 2027 में चुनौती बन सकती है।

बीजेपी-सपा के बीच मुकाबला कड़ा

वोट शेयर के अनुमान में भी उत्तर प्रदेश में मुकाबला दिलचस्प दिखाई दे रहा है। सर्वे के अनुसार भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 41.8 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है, जबकि समाजवादी पार्टी के गठबंधन को 38.7 प्रतिशत समर्थन मिलता दिख रहा है।

दोनों के बीच अंतर सीमित होने के कारण चुनाव से पहले किसी एक गठबंधन को निर्णायक बढ़त की स्थिति में मानना जल्दबाजी होगी। ऐसे में उम्मीदवारों का चयन कई विधानसभा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

युवा और 45+ मतदाताओं का अलग रुझान

उत्तर प्रदेश में उम्र के आधार पर मतदाताओं की पसंद में भी अंतर दिखाई देता है। 45 वर्ष से अधिक आयु के मतदाताओं में योगी आदित्यनाथ और भाजपा के प्रति समर्थन अपेक्षाकृत मजबूत बताया गया है, जबकि युवा मतदाताओं में अखिलेश यादव की ओर झुकाव अधिक दिखाई देता है।

युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा, महंगाई और भविष्य के अवसर जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। वहीं अधिक उम्र के मतदाताओं के बीच नेतृत्व, स्थिरता और सरकार के प्रदर्शन जैसे मुद्दों की भूमिका अधिक हो सकती है।

उत्तराखंड में भी विधायकों की छवि महत्वपूर्ण

उत्तराखंड में भी मौजूदा विधायकों को लेकर असंतोष का संकेत मिला है। राज्य में भाजपा की स्थिति मजबूत दिखाई देने के बावजूद कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय उम्मीदवार की छवि चुनावी समीकरण बदल सकती है।

उत्तराखंड में अभी बड़ी संख्या में मतदाता अंतिम फैसला नहीं कर पाए हैं। ऐसे में चुनाव के करीब आने के साथ मुद्दों और उम्मीदवारों के आधार पर मतदाताओं का रुख बदल सकता है।

क्या बड़े पैमाने पर कटेंगे मौजूदा विधायकों के टिकट?

सर्वे के आंकड़ों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश उम्मीदवार चयन को लेकर है। यदि चुनाव तक विधायकों के खिलाफ नाराजगी बनी रहती है तो राजनीतिक दल एंटी-इनकंबेंसी कम करने के लिए मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों को मैदान में उतारने की रणनीति अपना सकते हैं।

हालांकि, टिकट काटने का अपना जोखिम भी है। मौजूदा विधायक बगावत कर सकते हैं, निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं या पार्टी के भीतर असंतोष पैदा कर सकते हैं।

यही कारण है कि आने वाले महीनों में राजनीतिक दल अपने विधायकों के स्थानीय प्रदर्शन, जनता से संपर्क, संगठन में पकड़ और चुनाव जीतने की क्षमता का आकलन कर सकते हैं।

2027 में ‘स्थानीय चेहरा’ बन सकता है गेमचेंजर

इन सर्वेक्षणों से फिलहाल एक अहम संकेत जरूर मिलता है कि मतदाता मुख्यमंत्री और स्थानीय विधायक को एक ही नजर से नहीं देख रहे हैं।

यूपी में योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता के बावजूद 49 प्रतिशत मतदाताओं का विधायक से असंतोष और पंजाब में भगवंत मान की लोकप्रियता के बीच 45.3 प्रतिशत विधायकों के प्रति नाराजगी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी है।

हालांकि, सर्वे के आंकड़ों को चुनाव का अंतिम परिणाम नहीं माना जा सकता। मतदान में अभी समय है और तब तक सरकारों के फैसले, विपक्ष की रणनीति, गठबंधन, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और राजनीतिक घटनाक्रम मतदाताओं की राय को काफी प्रभावित कर सकते हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2027 में जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह के साथ मुख्यमंत्री के चेहरे को प्राथमिकता देगी या अपने विधानसभा क्षेत्र के उम्मीदवार के कामकाज और छवि को। यदि स्थानीय उम्मीदवार के खिलाफ नाराजगी बनी रहती है, तो कई सीटों पर टिकट वितरण ही चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा दांव बन सकता है।

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